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(नवरोज के दुबाश प्रोफेसर, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च)
(साभार हिंदुस्तान )
भारत क्या विकास, रोजगार सृजन, बढ़ते पर्यावरण संकट और असमानता से मजबूती से मुकाबला साथ-साथ कर सकता है? पारंपरिक सोच के अनुसार, ये लक्ष्य क्रमिक रूप से प्राप्त किए जा सकते हैं, पहले विकास करो और बाद में सफाई करो, या पहले विकास करो और बाद में पुनर्वितरण करो। कुछ तात्कालिक उपाय संकेत करते हैं कि हम इस मोर्चे पर बेहतर कर सकते हैं। विकास की नीति में सरकार की भूमिका से ही बहस की शुरुआत होती है। क्या सरकार स्वयं को केवल कानून-व्यवस्था, वित्तीय सेहत और बाजार को अच्छे से काम करने में सक्षम बनाने तक सीमित कर ले? वैश्विक रूप से हरित औद्योगिक नीति पर बहस हाशिये से निकलकर मुख्यधारा में आने लगी है। चीन अपनी अर्थव्यवस्था का परिचालन ऐसे कर रहा है कि उसके अक्षय ऊर्जा उद्योग में प्रतिस्पद्र्धा का माहौल बन जाए। अमेरिका में नए हरित सौदे पर बहस चल रही है, वहां प्रगतिशील समूह मांग कर रहे हैं कि मूलभूत ढांचे को भी हरित स्वरूप में लाया जाए और जलवायु परिवर्तन का ध्यान रखते हुए भी रोजगार सृजन किया जाए। फ्रांस की सड़कों पर ईंधन पर लगे एक टैक्स के विरुद्ध हुए प्रदर्शन ने यूरोप में इस बहस को बढ़ाया है कि क्या सामाजिक असमानता को ध्यान में रखे बगैर हरित नीति व्यावहारिक हो सकती है? यह बहस भारत में भी उभर रही है। पहली बात, जो देश 6-8 प्रतिशत की दर से विकास कर रहा है, वहां बड़े दिशागत बदलाव का बहुत असर हो सकता है। रेल, आवास निर्माण और ऊर्जा मांग के क्षेत्र में पर्यावरण अनुकूल राहों पर चलने का भारत के पास अवसर है। इस मोर्चे पर अगर भारत ने सक्रियता नहीं दिखाई, तो वह स्वयं को ऊर्जा अक्षमता और पर्यावरण की दृष्टि से खराब विकास में कैद कर लेगा। दूसरी बात, जब देश वैश्विक जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे हैं, तब हरित होना फायदेमंद भी होगा। उदाहरण के लिए, क्या भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के मितव्ययी लचीले तरीके बनाने में विश्व में अगुआ बन सकता है? तीसरी बात, एलईडी बल्बों के सार्वजनिक वितरण को बढ़ावा देकर भारत एक हद तक सफल प्रयोग कर चुका है। पर इस अवसर को पूरी तरह से भुनाने के लिए रणनीतिक दृष्टिकोण से संपूर्ण औद्योगिक नीतियों को गढ़ना होगा। इस दिशा में सावधान सब्सिडी व सहयोग राशि, नवाचार, सार्वजनिक निवेश और खरीद को पूरी तरह उपयोग में लाने की जरूरत पड़ेगी। चौथी बात, यदि हम हरित परिवर्तन लाना चाहते हैं, तो हमें वितरण और न्याय के प्रश्नों से लगातार जूझना होगा। जैसे, अक्षय ऊर्जा की ओर जब हम बढ़ेंगे, तो उसका दबाव कोयला-संपन्न राज्यों पर पडे़गा। ऐसे इलाकों में जीविका के नए स्रोत तलाशना चुनौती होगी। क्या भारत सफलतापूर्वक एक हरित औद्योगिक नीति विकसित कर सकता है? ऐसी औद्योगिक नीति बनाने के लिए बहुत सजग-सक्रिय सरकार की जरूरत पड़ेगी। हरित विकास के आकांक्षियों को आगे लाना होगा। उन कंपनियों को आगे लाना होगा, जो हरित नीति का लाभ उठाना चाहती हैं। हाल के अनुभव बताते हैं कि सरकार नई आकस्मिक उपायों-परियोजनाओं की घोषणा तो कर देती है, मगर उसको मजबूती देने के लिए जरूरी ढांचे या क्षमता का विकास नहीं करती। हम अक्षय ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक वाहनों से लक्ष्य पाने का ढिंढोरा तो पीटते हैं, लेकिन इन मोर्चों पर आ रही समस्याओं के समाधान के लिए कारगर नीति बनाने में विफल हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, हरित औद्योगिक नीति पर शोध कर रहे ईश्वरन नरसिम्हन यह पाते हैं कि सौर ऊर्जा अभियान के तहत घरेलू सौर उद्योग खड़ा करने और सौर क्षेत्र में रोजगार सृजन में हम बहुत पीछे रह गए हैं। यहां तीसरे स्तंभ अर्थात कार्यपालिका में न्यायपूर्ण वितरण एजेंडा विशेष रूप से नदारद है। हरित औद्योगिक नीति पर काम करना भारत के लिए समयानुकूल है। हमें रोजगार चाहिए, हमें हरित होने की जरूरत है, और वितरण के प्रश्नों से जूझे बिना इन दोनों की प्राप्ति नहीं हो सकती। हम इन लक्ष्यों को छोड़ नहीं सकते, पर इनमें सफलता की शर्तें कठोर हैं, इसके लिए कहीं अधिक सक्षम राज्य की जरूरत पड़ेगी। (ये लेखक के अपने विचार हैं)