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इंदिरा-मुजीब संधि : शेख की हत्या के बाद इस समझौते की भी हो गई थी अकाल मौत

(साभार दैनिक भास्कर )

    भारतीय सेना के सामने 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के समर्पण के साथ ही नए बांग्लादेश का उदय हो चुका था। शेख मुजीबुर्रहमान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बन चुके थे। श्रीमती इंदिरा गांधी ने जिस तरह से अमेरिका समेत कई देशों द्वारा पाकिस्तान को समर्थन देने के बावजूद बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी को समर्थन दिया और दुनिया के नक्शे पर एक नया देश स्थापित किया वह अपने आप में मिसाल बन चुका था। भारत ने उस समय पाकिस्तानी सेना के जुल्मों से बचाने के लिए करीब एक करोड़ बांग्लादेशियों को पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा व मेघालय में शरण दी थी। बांग्लादेश के गठन में भारत की भूमिका को देखते हुए मुजीबुर्रहमान ने भारत से मजबूत संबंध बनाने की पेशकश की और दोस्ती, सहयोग और शांति के समझौते की पेशकश की। यही नहीं ढाका के सुहरावर्दी उद्यान में इंदिरा व मुजीब ने पांच लाख लोगों की एक विशाल सभा को भी संबोधित किया। संधि के प्रमुख बिंदु:
1.दोनों देश एक-दूसरे के साथ मित्रता और शांति बनाए रखेंगे और एक-दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करेंगे। इसके अलावा वे किसी के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देंगे।
2.दोनों देश किसी भी तरह के उपनिवेशवाद और नस्लवाद की निंदा करते है तथा इसके समूल उन्मूलन के लिए काम करते रहेंगे।
3.दोनों देश दुनिया से तनाव कम करने के लिए निर्गुट और सह-अस्तित्व की नीति पर काम करेंगे।
4.दोनों देशों के हितों को प्रभावित करने वाली अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर वे नियमित संपर्क में रहेंगे, आपस में विचारों का आदान-प्रदान करेगे।
5.दोनों देश आर्थिक, व्यापार, यातायात, विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में आपसी सहयोग को बढ़ाएंगे।
6.दोनों देश बाढ़ नियंत्रण, नदी बेसिन के विकास व जल विद्युत ऊर्जा के क्षेत्र में संयुक्त अध्ययन के द्वारा कार्रवाई करेंगे।
7.दोनों देश कला, साहित्य, शिक्षा, संस्कृति, खेल व स्वास्थ्य के क्षेत्र में संबंधों को बढ़ाएंगे।
8.दोनों देशों में से कोई भी ऐसे किसी सैन्य गठबंधन में शामिल नहीं होगा, जो इनमें से किसी भी देश के खिलाफ हो। इसके अलावा दोनों में से कोई भी देश अपनी सीमा को दूसरे देश के खिलाफ किसी भी ऐसे काम के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देगा, जिससे किसी की भी सुरक्षा को खतरा पैदा होता हो।
9.यदि कोई तीसरा पक्ष दोनों में से किसी भी देश से सैन्य संघर्ष में उलझता है तो उसको कोई मदद नहीं की जाएगी। यदि दोनों में से किसी भी देश पर हमला होता है या हमले की धमकी दी जाती है तो दोनों तत्काल बातचीत कर इसे टालने की कोशिश करेंगे।
10.दोनों देश ऐसे किसी भी देश से कोई ऐसा समझौता नहीं करेंगे जो इस संधि की भावनाओं को प्रतिकूल हो।
11.इस संधि के किसी भी प्रावधान पर मतभेदों को आपसी सम्मान और समझ के आधार पर बातचीत से हल किया जाएगा।
शुरुआत में इस संधि को दोनों ही देशों ने बहुत ही जोशीले तरीके से स्वीकार किया गया, लेकिन बाद में इसे लेकर बांग्लादेश के भीतर विरोध पनपने लगा। लोगों को लगता था की यह असमान है और इस पर भारत का प्रभाव है। बाद में फरक्का बैराज का विवाद और बांग्लादेश से भारतीय सैनिकों की वापसी जैसे कुछ ऐसे मुद्दे रहे, जिन्होंने दोनों देशों की दोस्ती की भावना को प्रभावित करना शुरू कर दिया। शेख मुजीब की भारत समर्थक नीतियां कई राजनेताओं व सेना को अखरने लगीं। 1975 में शेख मुजीब की हत्या के बाद बांग्लादेश में सैन्य शासन स्थापित हो गया और उसने भारत से दूरी बनानी शुरू कर दी। मुजीब की मौत के बाद बांग्लादेश ने पाकिस्तान समेत उन सभी देशों के साथ राजनयिक संबंध बनाने शुरू कर दिए, जिन्होंने बांग्लादेश बनाने का विरोध किया था। इनमें सऊदी अरब और चीन प्रमुख तौर पर शामिल हैं। इसके साथ बांग्लादेश ने उल्फा जैसे भारत विरोधी संगठनों को अपने यहां से काम करने की अनुमति दे दी। बांग्लादेश की खुफिया एजेंसियाें ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के साथ भी संबंध बना लिए। इसलिए 1997 में इस संधि के समाप्त होने के बाद दोनों ही देशों में इसका नवीनीकरण करने से इनकार कर दिया। ढाका में 19 मार्च 1972 को भारत और बांग्लादेश के बीच दोस्ती, सहयोग और शांति की संधि पर दस्तखत हुए थे। यह संधि 25 साल के लिए थी। 12 बिंदुओं वाली इस संधि पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्रहमान ने दस्तखत किए थे। इस संधि को इंदिरा-मुजीब संधि भी कहा जाता है। हालांकि, शेख मुजीब की हत्या के बाद एक तरह से इस संधि की अकाल मौत हो गई थी।

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