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(रहीस सिंह)
(साभार NBT )
नरेंद्र मोदी सरकार ने इस पूरे कार्यकाल में अमेरिका को खुश रखने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने अंततः अपना असली चेहरा प्रकट कर दिया है। अभी बीते दिनों राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भारत को मिले जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (जीएसपी)दर्जे के साथ तरजीही कारोबार खत्म करने के लिए हाउस ऑफ रेप्रिजेंटटिव्स को एक पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने भारत के साथ बढ़ते व्यापार घाटे का हवाला देते हुए यह कदम उठाने की बात कही है। ट्रंप का कहना है कि भारत अपने बाजार में अमेरिका को बराबर और उचित भागीदारी देने को लेकर आश्वस्त करने में विफल रहा है। नोटिफिकेशन जारी होने के एक महीने बाद यानी मई से यह नया कानून लागू हो जाएगा। केंद्रीय वाणिज्य सचिव अनूप वधावन का कहना है कि भारत ने वर्ष 2017-18 में अमेरिका को 48 अरब डॉलर मूल्यों के उत्पादों का निर्यात किया था जिनसे में सिर्फ 5.7 करोड़ डॉलर का निर्यात जीएसपी रूट के जरिए हुआ है। जीएसपी रूट से हुए व्यापार में 1.90 करोड़ डॉलर कीमत की वस्तुएं ही नि:शुल्क श्रेणी में आती हैं। इसलिए उनके मुताबिक अमेरिका के इस फैसले का भारत पर मामूली असर होगा। वाणिज्य सचिव के इस दावे पर कई तरह से सवाल उठाया जा सकता है। भारत को छोड़िए, पहले यह बताइए कि अमेरिका को इससे फायदा हो रहा है या नहीं/ अगर उसे भी खास फायदा नहीं हो रहा तो फिर वह ये कदम उठा क्यों रहा है/ क्या उस स्थिति में यह सवाल और ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो जाता कि वे कौन से हित हैं जो अमेरिका को ‘मामूली’ आर्थिक फायदा देने वाला ऐसा महत्वपूर्ण कदम उठाने को प्रेरित कर रहे हैं/ तथ्य यह है कि जैसे ही जीएसपी दर्जा खत्म होगा भारत के ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, केमिकल्स और इंजीनियरिंग क्षेत्रों के लगभग 2000 उत्पाद उसकी चपेट में आ जाएंगे। अमेरिकी प्रशासन का जीएसपी संबंधी निर्णय तनावग्रस्त भारतीय निर्यातकों के लिए परेशान करने वाला साबित हो सकता है। फिर भी भारतीय प्रशासन यदि आशावाद से ओत-प्रोत है तो इसका मतलब यह है कि वह या तो भ्रम में है या फिर अपना असली चेहरा दिखा नहीं रहा। अगर अमेरिकी प्रशासन अपनी प्रेफरेंशल ट्रेड पॉलिसी (कारोबार में तवज्जो) के जनरल सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज़ में से भारत को निकाल ही रहा है तो हमें इस सवाल से टकराना ही होगा कि भारत सरकार को अमेरिकी प्रशासन के आगे झुकते चले जाने से आखिर मिला क्या/ ध्यान रहे कि अमेरिका चार फाउंडेशनल अग्रीमेंट्स पर हस्ताक्षर करने के लिए लंबे समय से समय से भारत पर दबाव बना रहा था। इनमें पहला है- जनरल सिक्यॉरिटी ऑफ मिलिट्री इन्फर्मेशन अग्रीमेंट (ग्सोमिया) जिस पर भारत 2002 में हस्ताक्षर कर चुका है। शेष तीन- यानी लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरैंडम ऑफ अग्रीमेंट(लिमोआ), कम्यूनिकेशंस कंपैटिबिलिटी एंड सिक्यॉरिटी अग्रीमेंट (कॉमकासा) और बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन अग्रीमेंट फॉर जियो-स्पेशल कोऑपरेशन (बेका) हैं। ये समझौते इसलिए नहीं हो रहे थे क्योंकि भारत को लगता था कि अमेरिका इसके जरिए भारत के सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर, संचार और गुप्तचर व्यवस्था में घुस जाएगा। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने इनमें से दो पर हस्ताक्षर कर दिए। लिमोआ पर हस्ताक्षर के साथ ही अमेरिका ने भारत को मेजर डिफेंस पार्टनर कहकर भारत के सभी आर्मी, एयर और नेवल बेस प्रयुक्त करने का अधिकार हासिल कर लिया। अब भारत तो अमेरिकी एयर, आर्मी और नेवल बेस प्रयुक्त करने जाएगा नहीं, तो फायदा किसे हुआ/ जाहिर है अमेरिका को। यही स्थिति कॉमकासा की है क्योंकि इसके जरिए अमेरिका भारत से चीन-पाकिस्तान संवाद के इनपुट प्राप्त कर सकता है।