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(साभार दैनिक जागरण )
जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने का सवाल उतना आसान नहीं है जितना समझा जा रहा है। हमारे देश में भले इस बात का दावा बड़े जोर-शोर से किया जा रहा है कि भारत ने 2020 का कोपेनहेगन लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिया है, लेकिन असलियत यह है कि देश को आने वाले समय में सतत विकास के मॉडल पर तेजी से अमल करना होगा। कारण आने वाले समय में देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) जिस अनुपात में बढ़ेगा, उसमें ऊर्जा की खपत में लगातार कमी लाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। हकीकत यह है कि पेरिस समझौते के अनुरूप तापमान बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री तक सीमित रखने के प्रयास नाकाफी हैं। ब्राउन टू ग्रीन-2018 की रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है। इस रिपोर्ट में जी-20 देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों की समीक्षा की गई है। रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जाहिर की गई है कि जी-20 देशों की जीवाश्म ईंधन पर से निर्भरता घट नहीं रही है। अभी भी इन देशों में 82 फीसद तक जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल हो रहा है। सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया और जापान में तो यह निर्भरता 90 फीसद से भी अधिक है। खास बात यह कि कई देशों में जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी भी दी जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की तीव्रता में 33-35 फीसद तक की कमी लाने का एलान किया है, लेकिन पेरिस समझौते के अनुसार डेढ़ डिग्री के लक्ष्य के हिसाब से यह काफी कम है। क्लाइमेट ट्रांसपेरेंसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2030 तक भारत में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी करीब-करीब दोगुने से भी ज्यादा बढ़ोतरी होने की आशंका है। अभी यह 2454 मिलियन टन के करीब है जो 2030 तक 4570 मिलियन टन तक पहुंच जाएगी। जाहिर है यह उत्सर्जन दो डिग्री तापमान बढ़ोतरी के परिदृश्य से भी कहीं ज्यादा है। इसलिए भारत को विभिन्न क्षेत्रों के लिए अपने उत्सर्जन लक्ष्य नए सिरे से निर्धारित करने होंगे। रिपोर्ट के सह लेखक वैज्ञानिक जॉन बर्क का कहना है कि जी-20 देशों को तापमान बढ़ोतरी डेढ़ डिग्री सीमित रखने के लिए 2030 तक अपने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को आधा करना होगा, लेकिन दुख की बात यह है कि इस दिशा में कोई गंभीर पहल होती दिखाई नहीं दे रही है। यह उस स्थिति में और चिंता की बात है, जबकि आने वाले समय में दुनिया में कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर एक नए कीर्तिमान पर पहुंच जाएगा। इस साल कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर 411 पीपीएम हो जाएगा। गौरतलब है कि कुछ साल पहले ही कार्बन डाई ऑक्साइड के स्तर ने 400 पीपीएम का आंकड़ा छुआ था। वैश्विक तापमान बढ़ने का कारण कार्बन उत्सर्जन में बढ़ोतरी भी है जिसमें लगातार तेजी से वृद्धि हो रही है। उद्योग जगत के शुरुआती काल में कार्बन डाई ऑक्साइड का आंकड़ा वैश्विक स्तर पर 280 पीपीएम था जो हजारों साल के बाद इस स्तर पर पहुंचा था। खास बात यह कि उस समय यह चिंताजनक स्थिति में नहीं था। 1950 के बाद से वैश्विक वातावरण में कार्बन के स्तर में बढ़ोतरी की शुरुआत हुई। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था आइपीसीसी की रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि 2040 तक दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री तक बढ़ जाएगा। यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर अंकुश नहीं लगाया गया तो 2040 तक स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी। जलवायु परिवर्तन का असर मौसम पर साफ-साफ दिखने लगा है। देश में बीते साल विनाशकारी घटनाओं के गवाह रहे हैं। वह चाहे उत्तरी भारत में आई धूल भरी आंधियां हों या फिर केरल की प्रलयंकारी बाढ़। पिछले साल देश में चक्रवात, बिजली गिरने, भीषण गर्मी, कड़ाके की ठंड और मूसलाधार बारिश जैसी मौसम की मार से तकरीबन 1428 लोग अनचाहे मौत के मुंह में चले गए। इनमें सबसे ज्यादा मौतें 590 अकेले उत्तर प्रदेश में हुईं। वहीं बीता साल पिछले 117 वर्षो में छठवां सबसे गर्म साल रहा। बीते साल देश के औसत तापमान में 0.41 डिग्री की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 1981-2010 के बीच के इन तीस वर्षो में 0.72 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई। 2018 की सर्दियों में भी तापमान सामान्य से ज्यादा ही रहा। 2018 में जनवरी-फरवरी में औसत तापमान में 0.59 डिग्री की बढ़ोतरी हुई। 1901 के बाद से यह इन महीनों में पांचवां सर्वाधिक गर्म साल रहा। बीते दशकों में 15 साल रिकॉर्ड सबसे गर्म साल रहे हैं। इनमें 2009, 2010, 2015, 2016, 2017 और 2018 सबसे गर्म साल रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार साल 2001-10 के बीच दशकीय तापमान सामान्य से 0.23 डिग्री ज्यादा रहा, जबकि साल 2011-18 के बीच यह 0.37 डिग्री ज्यादा दर्ज किया गया। इस बीच तापमान में औसत सालाना बढ़ोतरी की दर 0.6 डिग्री सेल्सियस रही है। यह इस बात का साक्षी है कि बीते कुछ वर्षो में जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर देखने को मिला है। वैज्ञानिक अध्ययन और शोध प्रमाणित करते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले दिनों में गर्मियों में बेहद गर्मी पड़ेगी। वैश्विक तापमान खासकर आर्कटिक में तापमान बढ़ने से वातावरण में ऐसी ऊर्जा उत्पन्न हो रही है जो मौसम को बेहद गर्म बना देगी। परिणामस्वरूप भारत समेत उत्तरी गोलार्ध के क्षेत्रों में मौसमी स्थितियां निष्क्रिय हो सकती हैं और गर्मियों में भयंकर तूफान आएंगे। यदि अगले बीस वर्षो में कार्बन उत्सर्जन कम नहीं हुआ तो आर्कटिक महासागर ग्रीष्मकाल में ही बर्फ मुक्त हो जाएगा। यही नहीं सितंबर माह में आर्कटिक महासागर से बर्फ बिल्कुल खत्म हो सकती है। इसका सबसे बड़ा कारण इन क्षेत्रों का विशेष रूप से वैश्विक तापमान में परिवर्तन के प्रति संवेदनशील होना है। अगर पृथ्वी विज्ञान मंत्रलय के सचिव एम राजीवन की मानें तो बीते दो दशकों में तापमान में हुई बढ़ोतरी चिंताजनक है। इसे रोकना ही होगा। सौर ऊर्जा, वन क्षेत्र में बढ़ोतरी, एलईडी लाइटों के इस्तेमाल को प्रोत्साहन, स्मॉग टॉवर और स्पेस फ्यूल का प्रयोग ग्रीनहाउस गैसों पर रोक लगाने में कारगर हो सकता है। इस सबके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति बेहद जरूरी है। इसके बिना ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर रोक की उम्मीद बेमानी है।