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(साभार दैनिक भास्कर )
(ललित झा )
ट्रम्प प्रशासन को लगता है तालिबान के साथ शांति वार्ता आगे बढ़ाने में मदद मिली है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय से आ रही खबरें यही बताती हैं। सालभर पहले इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। उम्मीद इतनी उजली है कि खुद विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ क्षेत्र में जाने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं ताकि प्रक्रिया को गति दी जा सके। शांति प्रयासों का नेतृत्व वरिष्ठ राजनयिक जल्मे खलीलजाद कर रहे हैं। वे जॉर्ज बुश प्रशासन में अफगानिस्तान व ईरान और संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत रहे हैं। पूर्व में कई प्रयास किए गए पर बात आगे नहीं बढ़ी, क्योंकि तालिबान अमेरिकी फौज की वापसी मांगता। अमेरिका कहता अफगान संविधान को मानो, अल कायदा से नाता तोड़ो और हिंसा छोड़ो। दोनों अपनी बात पर अड़े थे। काफी प्रयास के बाद ओबामा प्रशासन के दौरान शुरुआती संपर्क हुआ। अमेरिका ने गुआंतेनामो जेल से कुछ आतंकी रिहा किए और कतर ने दोहा में तालिबान की मौजूदगी संभव बनाई लेकिन, बीच राह में जाकर यह बातचीत भी टूट गई। ट्रम्प अफगानिस्तान से फौज वापस लेने के वादे पर सत्ता में आए। अगस्त 2017 में उन्होंने नई दक्षिण एशिया नीति घोषित की। इससे जमीन पर कोई फर्क नहीं पड़ा। सितंबर 2018 में पोम्पियो ने खलीलजाद को तालिबान से बातचीत और सैनिकों की वापसी की संभावना टटोलने के स्पष्ट मकसद से दूत बनाया। काबुल में जन्मे खलीलजाद सारे प्रमुख दावेदारों से वाकिफ हैं। ट्रम्प जब प्रत्याशी थे तो उन्होंने वाशिंगटन में विदेशी मामलों पर उनका पहला प्रमुख भाषण आयोजित किया था। निजी स्तर पर वे कांग्रेस की एक प्रमुख समिति के सामने उपस्थित हुए थे। इसमें उन्होंने अमेरिकी सरकार से आग्रह किया था कि अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला देश घोषित करे। छह माह से भी कम समय में खलीलजाद बर्फ पिघलाने में कामयाब रहे। तालिबान से गंभीर चर्चा शुरू हुई। इस बार तालिबान का प्रतिनिधित्व इसके संस्थापक व शीर्ष नेता मुल्ला बरादर कर रहे हैं। खलीलजाद के अनुरोध पर ही पाकिस्तान ने उन्हें आठ साल की नज़रबंदी से रिहा किया था। खलीलजाद ने 25 फरवरी को ट्वीट किया, मुल्ला बरादर व उनकी टीम के साथ वर्किंग लंच किया। पहली बार मिलने के बाद अब हम महत्वपूर्ण काम की और बढ़ रहे हैं। काबूल में भी एक नेशनल टीम तैयार है, जो अफगानिस्तान के भीतर संवाद व तालिबान से चर्चा करेगी। खलीलजाद व उनकी टीम अब भी दोहा में है। आतंकवाद विरोध, सैनिकों की वापसी, अफगानस्तान में भीतरी संवाद और तालिबान से चर्चा इस मुलाकात के चार मुख्य मुद्दे हैं। 4 मार्च को लोवा में किसानों से चर्चा के बीच पोम्पियो ने कहा, उम्मीद है उन्हें (खलीलजाद) इतनी सफलता मिले कि अगले हफ्ते-दो हफ्तों मैं वहां जाऊं वार्ता को आगे बढ़ाने में खुद कुछ मदद करूं। विदेश विभाग ने साफ नहीं किया कि वे दोहा जाने की बाद कर रहे थे या काबुल ताकि अफगानिस्तान के निर्वाचित प्रतिनिधि वार्ता में शामिल हो सकें। यदि ऐसा हुआ तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। न तो पोम्पियो और न उनके विदेश विभाग ने वार्ता के बारे में कुछ बताया है। पोम्पियो ने कहा है कि खलीलजाद व उनकी टीम और तालिबान ऐसे क्षेत्र खोज रहे हैं जिस पर काफी सहमति हो और हर कोई अगे बढ़ सके। फिर जटिल मुद्दों लेकर किसी करार तक पहुंच सकें। पहले ऐसी सभी वार्ताओं में पाकिस्तान को वीटो पावर होता था, जो भारत को इससे बाहर रखने पर जोर देता था। लेकिन, अब इस्लामाबाद ऐसा अधिकार नहीं चला पाता। तालिबान व अन्य आतंकी गुटों पर इसके प्रभाव को देखते हुए इसमें शक नहीं कि बातचीत की सफलता काफी कुछ उसके सहयोग पर निर्भर होगी। इससे ट्रम्प प्रशासन भी अच्छी तरह वाकिफ है। लेकिन, भारत ने 9/11 के बाद अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर जो विकास कार्य किया है और देश की निर्वाचित सरकार के साथ मिलकर चुपचाप काम करने की इसकी नीति ने अफगान लोगों में बहुत सद्भावना अर्जित की है। इससे वह भी ऐसी किसी शांति वार्ता में महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन गया है। समझा जाता है कि खलीलजाद और अमेरिकी टीम ने भूतकाल के विपरीत पाकिस्तानी दबाव को न मानते हुए भारत को वार्ता की प्रगति से वाकिफ रखा है। 9/11 और अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजें आने के बाद दक्षिण एशिया की जमीनी हकीकत में बहुत बदलाव आया है। इन करीब दो दशकों में भारत प्रमुख वैश्विक व क्षेत्रीय शक्ति बनकर उभरा है। न सिर्फ इसके पास शक्तिशाली सेना है बल्कि यह दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। अपनी विकासात्मक नीति के फलस्वरूप भारत अफगानिस्तान के लगभग हर हिस्से में मौजूद है। गौरतलब है कि 2001 में तो काबुल में भारत का दूतावास भी नहीं था। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने धीरे-धीरे अफगानिस्तान से सुरक्षा मामलों पर भी सहयोग शुरू किया, जिसमें सुरक्षा बलों की ट्रेनिंग के लिए हेलिकॉप्टर जैसे सैन्य हार्डवेयर उपलब्ध करना आदि शामिल है। फिर ईरान में चाबहार बंदरगाह के निर्माण के जरिये भारत ने समुद्र तक पहुंच के लिए अफगानिस्तान की पाकिस्तान पर निर्भरता खत्म करने की प्रक्रिया तेज की है। इन सारे वर्षों में भारत ने जहां पैठ बनाई हैं, पाकिस्तान के लिए स्थिति एकदम उलट है। मुख्यतः इसकी धमकाने की नीति के कारण। यह प्रायः काबुल के साथ शाब्दिक युद्ध में उलझ जाता है, जो उस पर सीमा पार से आतंकवाद संचालित करने का आरोप लगाता है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भी पाकिस्तान के आज कुछ ही समर्थक हैं। भारत व अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकवाद में गैर-सरकारी किरदारों को इसके समर्थन का भंडाफोड़ हो गया है। फिर इसकी अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई है। जहां तालिबान पर पाकिस्तान का अब भी काफी असर है पर उसके शीर्ष नेतृत्व में वह गुट बढ़ रहा है, जो उसके शिकंजे से बाहर अना चाहता है। इसमें मुल्ला बरादर शामिल है, जो यह भुला नहीं है कि उसे पाकिस्तान ने करीब एक दशक सिर्फ इसलिए नजरबंद रखा, क्योंकि उसने 2010 में बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका से सीधे संपर्क का प्रयास किया था। (ये लेखक के अपने विचार हैं)