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गरीब के लिए बढ़े कॉरपोरेट मदद

(डॉ. जयंतीलाल भंडारी )

(साभार दैनिक जागरण )

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में कॉरपोरेट जगत से अपील की है कि उन्हें कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत गरीबों की मदद के लिए पहुंच का दायरा बढ़ाना चाहिए। देश में कई इलाकों में अब भी भूख और कुपोषण की गंभीर समस्या है। हाल ही में प्रकाशित वैश्विक स्वास्थ्य, कुपोषण और भूख से संबंधित रिपोर्ट्स भी इसकी ताकीद करती हैं। उल्लेखनीय है कि भुखमरी और कुपोषण के उन्मूलन हेतु कोई व्यय किया जाना सीएसआर के निर्धारित लक्ष्यों में शामिल है। विगत वित्त वर्ष में सीएसआर के तहत 13 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों की ओर सीएसआर व्यय का प्रवाह बढ़ाकर बड़ी संख्या में लोगों को कुपोषण और भूख से राहत दी जा सकती है। मालूम हो कि हाल ही में घोषित वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा सूचकांक में 195 देशों में भारत को 57वें स्थान पर रखा गया। इसी तरह 16 अक्टूबर को यूनिसेफ द्वारा प्र काशित रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ द वल्र्डस चिल्ड्रेन’ में भी कहा गया है कि भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के 69 फीसद बच्चों की मौत का कारण कुपोषण है। यूनिसेफ का यह भी आकलन है कि महज 42 फीसद बच्चों को ही समय पर खाना मिलता है। इसी तरह भारत में भूख की समस्या से संबंधित रिपोर्ट वैश्विक भूख सूचकांक के रूप में 15 अक्टूबर, 2019 को प्रकाशित हुई है। वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआइ)-2019 में 117 देशों की सूची में भारत 102वें पायदान पर पाया गया। भारत की निम्न रैंकिंग का एक बड़ा कारण बताया गया कि यहां पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में ऊंचाई के अनुपात में कम वजन वाले बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ी है। साथ ही भारत के छह से 23 महीने के बच्चों में से मात्र 9.6 फीसद बच्चों को ही न्यूनतम स्वीकार्य आहार मिल पाता है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का भी कहना है कि भारत में भूख से पीड़ितों तथा कुपोषित बच्चों की बढ़ती तादाद चिंताजनक है। बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड और असम जैसे राज्यों में यह समस्या लंबे समय से चिंता बढ़ाती दिख रही है। जन्म के बाद बच्चों को जिन पोषक तत्वों और स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता होती है, वे बच्चों को मिल नहीं पाते हैं। स्थिति यह है कि ना तो बच्चों का ढंग से टीकाकरण हो पाता है, ना ही उनकी बीमारियों का समुचित इलाज। देश में विकास के साथ-साथ आर्थिक असमानता का परिदृश्य भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। अभी जो भूख और कुपोषण की चुनौती सामने खड़ी है, उससे निपटने के लिए तात्कालिक रूप से सीएसआर व्यय राहतकारी भूमिका निभा सकता है। ऐसे में इस समय कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के परिपालन के तहत स्वास्थ्य, कुपोषण और भूख की चिंताएं कम करने के लिए सीएसआर व्यय बढ़ाने को प्राथमिकता देना जरूरी है। उल्लेखनीय है कि 500 करोड़ रुपये या इससे ज्यादा नेटवर्थ अथवा पांच करोड़ रुपये या इससे ज्यादा मुनाफे वाली कंपनियों को पिछले तीन साल के अपने औसत मुनाफे का दो प्रतिशत हिस्सा हर साल सीएसआर के तहत उन निर्धारित गतिविधियों में खर्च करना होता है, जो समाज के पिछड़े या वंचित लोगों के कल्याण के लिए जरूरी हों। इनमें भूख, गरीबी और कुपोषण पर नियंत्रण, कौशल प्रशिक्षण, शिक्षा को बढ़ावा, पर्यावरण संरक्षण, खेलकूद प्रोत्साहन, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, तंग बस्तियों के विकास आदि पर खर्च करना होता है। लेकिन विभिन्न अध्ययनों में पाया गया कि बड़ी संख्या में कंपनियां सीएसआर के उद्देश्य के अनुरूप खर्च नहीं करती हैं। हालांकि विगत अगस्त में सरकार ने जिस कंपनी (संशोधन) विधेयक- 2019 को पारित किया है, उसमें उन कंपनियों पर जुर्माना लगाने के प्रावधान भी शामिल हैं जो सीएसआर के लिए अनिवार्य दो फीसद का खर्च नहीं करती हैं। नए संशोधनों से कंपनियों की सीएसआर गतिविधियों में जवाबदेही तय करने में आसानी होगी। कंपनी अधिनियम की धारा 135 के नए सीएसआर मानकों के मुताबिक यदि कोई कंपनी अपने मुनाफे का निर्धारित हिस्सा निर्धारित सामाजिक गतिविधियों पर खर्च नहीं कर पाए तो जो धनराशि खर्च नहीं हो सकी उसे कंपनी से संबद्ध बैंक में सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी एकाउंट में जमा किया जाना होगा। कंपनियों को सीएसआर का बगैर खर्च किया हुआ धन प्रधानमंत्री राहत कोष जैसी मदों में डालना होगा। ऐसे में अभी तक जो कंपनियां सीएसआर को रस्मअदायगी मानकर उसके नाम पर कुछ भी कर देती थीं, उनके लिए अब मुश्किल हो सकती है। सीएसआर के मोर्चे पर सरकार सख्ती करने जा रही है। कंपनियां केवल यह कहकर नहीं बच पाएंगी कि उन्होंने सीएसआर पर पर्याप्त रकम खर्च की है। अब उन्हें यह बताना पड़ेगा कि खर्च किस काम में किया गया? उस खर्च का नतीजा क्या निकला और समाज पर उसका कोई सकारात्मक असर पड़ा या नहीं? उन्हें यह भी बताना होगा कि क्या यह खर्च कंपनी से जुड़े किसी संगठन पर हो रहा है? नए नियमों के तहत निचले स्तर पर शामिल कंपनियों के लिए सीएसआर में हुए न्यूनतम खर्च को बताने की बाध्यता होगी, खर्च की रकम बढ़ने के साथ-साथ अधिक से अधिक जानकारी देनी होगी। जिस तरह देश में कॉरपोरेट जगत निरंतर नई बुलंदियों की ओर बढ़ रहा है, उसी के मुताबिक उसके सामाजिक उत्तरदायित्व में भी इजाफा होना लाजिमी है। देश में कॉरपोरेट जगत के सामाजिक उत्तरदायित्व की नई जरूरतें उभरकर सामने आई हैं। ज्ञातव्य है कि सीएसआर किसी तरह का दान नहीं है। दरअसल यह सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ कारोबार करने की व्यवस्था है। कॉरपोरेट जगत की यह जिम्मेदारी है कि वह स्थानीय समुदाय और समाज के विभिन्न वर्गो के बेहतर जीवन और रहन-सहन के लिए सकारात्मक भूमिका निभाए। खासतौर से देश में कुपोषण एवं भूख की चिंताओं को कम करने के लिए सीएसआर के दायरे का विस्तार प्रमुख सामाजिक जरूरत है। इसी तरह हमें श्रम कौशल से जुड़ी योजनाओं पर भी सीएसआर व्यय बढ़ाना होगा। श्रम कौशल के आधार पर देश में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देकर उन्हें कुपोषण और भूख से बचाया जा सकेगा। हम आशा करें कि समाज के कमजोर और वंचित तबके के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने तथा देश में मौजूद कुपोषण एवं भूख की समस्या से निपटने में कॉरपोरेट जगत अपना योगदान बढ़ाएगा और सीएसआर व्यय के माध्यम से अधिक सार्थक भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

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