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(राजीव शर्मा)
हाल में चेन्नई के निकट मामल्लापुरम में संपन्न (11-12 अक्टूबर) भारत-चीन अनौपचारिक शीर्ष बैठक कई मायनों में अनूठी राजनयिक कवायद थी। ऐसी बैठक थी, जिसमें कोई भी पक्ष आखिर तक आास्त नहीं था कि बैठक होगी भी कि नहीं। यही कारण है कि दोनों पक्षों ने बैठक होने के मुश्किल से दो रोज पहले ही इसकी औचारिक घोषणा की थी। सामान्य स्थितियों ऐसी शीर्षस्तरीय बैठक, भले ही यह अनौपचारिक थी, के लिए हफ्तों पहले औपचारिक घोषणा कर दी जाती। उस सूरत में तो और भी जब एशिया की पहले नम्बर और तीसरे नम्बर की अर्थव्यवस्था (क्रमश: चीन और भारत) के शीर्ष नेतृत्व के बीच बैठक हो रही हो। लेकिन बहुत कुछ नकारात्मक घट रहा था, जिसके चलते इस आयोजन को गुप्त रखा गया। जैसे कि मामल्लापुरम शीर्ष बैठक के कोईपंद्रह दिन पहले क्वाड (चीन को नागवार लगने वाला चार शक्तिशाली देशों-अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत-का सामरिक समूह) ने पहली बार अपनी विदेश सचिव स्तर की बैठक को विदेश मंत्री स्तर की बैठक में बदल दिया था। इसके चलते सितम्बर के आखिरी हफ्ते में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के इतर इन देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई। क्वाड के सदस्य देशों का कहना है कि उसका समूह किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं लेकिन हकीकम में यह समूह चीन-विरोधी है। इसी तरह चीन ने पहली बार अपने कूटनय को धार देते हुए पाकिस्तान, तुर्की और मलयेशिया (भारत-विरोधी ताकतों) को अपने साथ जोड़ा। तुर्की और मलयेशिया ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कोल्स के मुद्दे भारत को घेरा था। बाद में इन देशों के शीर्ष नेताओं ने जम्मू-कश्मीर को लेकर पांच अगस्त को किए गए भारत के फैसले के खिलाफ आक्रामक कूटनीतिक अभियान छेड़ दिया था। भारत ने पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर में अनुच्चेद 370 तथा 35ए को भंग करके राज्य को दो केंद्र-शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया था। इस प्रकार एक प्रति-क्वाड उभर आई जिसमें चीन, पाकिस्तान, तुर्की और मलयेशिया शामिल हो गए। जैसे कि इतना ही काफी न था। मामल्लापुरम शीर्ष बैठक से ठीक पहले भारत और चीन के बीच अनेक अंदेशे मंडराने लगे। मामल्लापुरम शीर्ष बैठक से ठीक पहले चीन ने भारत को अप्रिय कदम उठाते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मेजबानी की। खान के साथ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक के उपरांत एक संयुक्त बयान जारी किया गया। इसमें कहा गया : ‘‘कश्मीर का मुद्दा विवादास्पद रहा है, और इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मुताबिक शांतिपूर्वक तरीके से सुलझाया जाना चाहिए।’ यह भारत के लिए उकसाने वाला बयान था क्योंकि बीते सात दशकों से भारत का यह दृढ़ मत रहा है कि इस समाधान को भारत और पाकिस्तान मिल बैठकर सुलझा सकते हैं, किसी तीसरे पक्ष की जरूरत नहीं। सारी दुनिया जानती है कि सात दशकों से चले आ रहे इस रुख को भारत ने, चाहे देश में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार रही हो, कभी नहीं बदला है। फिर, खिन्न करने वाली बात यह भी थी कि जम्मू-कश्मीर में भारत के फैसले पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विशेष र्चचा की चीन ने मांग की थी। चीन के नजरिए से भी मामल्लापुरम शीर्ष बैठक से पहले दो बातें अकुलाहट करने वाली थीं। एक, भारत ने अरुणाचल प्रदेश (भारतीय राज्य जिसे लेकर चीन सीमा विवाद बताता है) में भारत ने ‘‘हिम विजय’ नाम से सैन्य अभ्यास किया। यह अभ्यास दो चरणों में होना था। पहला झी के प्रस्तावित भारत दौरे से ठीक पहले और दूसरा उनके भारत दौरे के तत्काल बाद। चूंकि हांगकांग में तीन महीनों से झी खासे दबाव में हैं, और सैन्याभास से चीन को तनाव स्वाभाविक है। दूसरी बात यह कि भारत ने निर्वासित तिब्बत सरकार को दिल्ली में एक आयोजन करने की अनुमति दी, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं ने सेंट्रल तिब्बत एडमिनिस्ट्रेशन (सीटीए) के अध्यक्ष लॉबसांग सांगे के साथ मंच साझा किया। यह बात भी चीन को नागवार गुजरी। इस सबके बावजूद मामल्लापुरम शीर्ष बैठक संपन्न हुई और इसे सफल राजनयिक घटना के रूप में याद किया जाएगा। तमाम उकसाने और खिन्न कर देने वाली घटनाओं के बावजूद यह संपन्न हो सकी तो इसलिए दोनों शीर्ष नेताओं-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और झी जिनपिंग-ने अपने मतभेद दरकिनार रखे। विवाद नहीं बनने दिए। मामल्लापुरम शीर्ष बैठक में एक महत्त्वपूर्ण फैसला किया गया कि दोनों देशों के वित्त मंत्रियों के बीच एक ‘‘उच्चस्तरीय आर्थिक एवं व्यापार वार्ता प्रक्रिया’ आरंभ की जाए जिसके तीन लक्ष्य हों-व्यापर की मात्रा बढ़े, दुतरफा व्यापार में बड़ी खाई को पाटा जाए, और उन क्षेत्रों में परस्पर निवेश बढ़ाया जाए जिन्हें लेकर दोनों देशों में सहमति हो चुकी हो। राष्ट्रपति झी ने मामल्लापुरम शीर्ष बैठक से ठीक पहले से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मेजबानी की और शीर्ष बैठक के तत्काल नेपाल के लिए रवाना हो गए। दो दशक बाद चीन का कोई राष्ट्रपति नेपाल के आधिकारिक दौरे पर पहुंचा था। नेपाल-भारत-चीन तनावपूर्ण तिकड्डा है, लेकिन भारत किसी तीसरे देश के नेपाल के साथ राजनयिक संबंध बेहतर करने संबंधी प्रयासों पर आपत्ति नहीं कर सकता। नेपाल स्थित वरिष्ठ पत्रकार हिमेंद्र मोहन कुमार का नेपाल-भारत-चीन के त्रिकोण के बारे में कहा है, ‘‘नेपाल को भान है कि भौगोलिक रूप से वह चीन, जो विश्व की अघोषित महाशक्ति है, और भारत, जो नेपाल का हमेशा से मित्र राष्ट्र रहा है, के बीच स्थित है। यह भी जानता है कि दोनों देश अपने सामरिक हितों के मद्देनजर उसे अपने पाले में रखना चाहते हैं। वह अपनी इस भौगोलिक स्थिति काफायदा उठाना चाहता है। निवेश के अभाव का सामना कर रहा नेपाल चाहता है कि दोनों देशों से उसे निवेश मिल सके। वह भारत का भी मित्र है, और चीन का भी। भारत को अनदेखा नहीं कर सकता क्योंकि उसकी 90 प्रतिशत खाद्य जरूरतें भारत से पूरी होती हैं। सारा ईधन भारत से पहुंचता है। अलबत्ता, भारत में विमुद्रीकरण से नेपाल की अर्थव्यवस्था को झटका लगा है, जिससे अभी तक वह उभर नहीं पाया है। बहरहाल, भारत और चीन परस्पर बातचीत करने का सिलसिला जमाने की परिपक्वता दिखा रहे हैं। अनौपचारिक बैठकें मतभेदों को कम करने में साबित होती हैं। (RS)