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(संदीपन देब) (वरिष्ठ पत्रकार)
(साभार हिंदुस्तान )
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात के दौरान जिनपिंग ने जब चीन-भारत संबंधों को फिर से जीवंत बनाने के लिए अपनी शताब्दी योजना का जिक्र किया, तो मुझे दो वर्ष पहले पढ़ी एक किताब द हंड्रेड-ईयर मैराथन याद आ गई। इसे चीनी मामलों के एक वरिष्ठ अमेरिकी जानकार माइकल पिल्सबरी ने लिखा है। उन्होंने दशकों तक चीन-समर्थक नीतियों को आगे बढ़ाया, जिससे चीन को महाशक्ति बनने में मदद मिली। मगर आज उनका मानना है कि कई दूसरों की तरह (शिक्षाविदों से लेकर सांसदों व रिचर्ड निक्सन से लेकर बराक ओबामा जैसे राष्ट्रपतियों तक) चीन ने उन्हें भी मूर्ख बनाया। उनके पास मौजूद कई आंकड़े कि किस तरह अमेरिका ने लगातार (और अमूमन चोरी-छिपे) चीन की मदद की और बीजिंग ने कैसे वाशिंगटन को धोखा दिया, हमें चौंकाते हैं।
व्यापक व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित होने कारण यह किताब हमारी आंखें खोलती है। इसमें मुख्यत: तीन पहलुओं का जिक्र है। पहला, प्रमुख वैश्विक ताकत बनने के लिए चीन ने 100 साल की अपनी मैराथन कोशिश दशकों पहले शुरू कर दी थी, जिसका मकसद था, अपने मूल्यों (इसमें लोकतंत्र शामिल नहीं है) के मुताबिक दुनिया को नया आकार देना। इसके लिए 2049 का लक्ष्य रखा गया है, जो माओत्से तुंग द्वारा सत्ता हासिल करने का शताब्दी-वर्ष है। दूसरा पहलू है, चीन के नेतागण अपनी रणनीति प्राचीन ग्रंथों और इतिहास, विशेषकर युद्धरत राज्यों के काल (475 ईसा पूर्व से लेकर 221 ईसा पूर्व में किन राजवंश के अधीन एकीकरण तक) से तय करते हैं। और तीसरा, जब तक दुनिया इस बाबत जगेगी, चीन यह मैराथन दौड़ समय से पहले पूरी कर लेगा। किताब में चीनी भाषा की जटिलता का जिक्र भी किया गया है। चीनी शब्दों का सटीक अर्थ अक्सर बोलने वालों की शैली, संदर्भ और इरादे पर निर्भर करता है। इसी कारण, चीनी भाषा का अनुवाद आमतौर पर उसकी सही व्याख्या नहीं होता। मसलन, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ‘दा ताम’ शब्द का इस्तेमाल चीन के नेतागण अक्सर अपने मुल्क का लक्ष्य बताने के लिए करते हैं, जिसका अनुवाद किया जाता है, ‘सामंजस्य का युग’। मगर पिल्सबरी कहते हैं, इसका बेहतर अनुवाद ‘एकध्रुवीय प्रभुत्व’ होना चाहिए।
जब जिनपिंग 2012 में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने थे, तो अपने पहले संबोधन में उन्होंने ‘मजबूत राष्ट्र का सपना’ कहा था। ये शब्द चीन के किसी नेता ने सार्वजनिक रूप से नहीं कहे थे। तब तक इस तरह के भावनात्मक शब्द पश्चिमी देशों से सुने जाते थे, जैसे ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का नारा। इतना ही नहीं, तब तक चीन ने दुनिया के सामने अपनी कोई महत्वाकांक्षी घोषणा भी नहीं की थी। मगर अब ‘चीन का सपना’ उसका आधिकारिक लक्ष्य है, जिसे 2049 तक उसने पूरा करने की बात कही है। जाहिर है, इसे आर्थिक, सैन्य और सांस्कृतिक रूप से विश्व प्रभुत्व हासिल करना समझा जा सकता है।
शी जिनपिंग मानते हैं कि ‘शी’ को उन्होंने आत्मसात कर लिया है। ‘शी’ (इसका अंग्रेजी में सीधा अनुवाद नहीं किया जा सकता) दरअसल चीन की रणनीति का आधार है। इस अवधारणा को ‘शक्तियों को पंक्तिबद्ध’ करने की रणनीति कह सकते हैं, जिसका इस्तेमाल एक कुशल रणनीतिकार अपने से मजबूत प्रतिद्वंद्वी पर विजय हासिल करने के लिए कर सकता है। सन शू की किताब द आर्ट ऑफ वार बताती है कि कोई सक्षम रणनीतिकार इस नीति से हालात का मनमर्जी इस्तेमाल कर सकता है और दुश्मनों को भी अपने हित में काम करने को मजबूर कर सकता है। चीन का हर नेतृत्व इस नीति पर अमल करता है, जबकि युद्धरत राज्यों के काल में जीत के तमाम सिद्धांतों के मूल में धोखा और छल-कपट ही छिपा है।
‘सामंजस्य’ की इस राह में अब जो समस्या अचानक आन पड़ी है, वह हैं डोनाल्ड ट्रंप। चीन के लिए रणनीति के हिसाब से सब कुछ सही चल रहा था कि अचानक अपनी अप्रत्याशित शख्सियत के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सामने आ गए। मगर ऐसे मौकों पर ‘शी’ एक ऐसी रणनीति भी है, जो हेनरी किसिंजर (ऑन चाइना में वर्णित) के मुताबिक, ‘निरंतर बदलाव करते हुए मामलों को समझने की एक कला’ है। हालांकि पिल्सबरी फिलहाल ट्रंप के सलाहकार हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)