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(प्रदीप)
(साभार दैनिक जागरण )
कंप्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन के जरिये इंटरनेट की मांग दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। इंटरनेट से जुड़ी सुविधाओं में अभी तक 1जी, 2जी, 3जी और 4जी से दुनिया के सुदूर कोने में बैठे इंसान को उससे दूरस्थ इंसान से प्रभावी रूप से संपर्क स्थापित करने की सहूलियत प्राप्त हुई है। अब 5जी टेक्नोलॉजी आने वाली है जिससे न केवल इंटरनेट की रफ्तार बढ़ेगी, बल्कि मशीन से मशीन के जुड़ने यानी इंटरनेट ऑफ थिंग्स के नए दौर की शुरुआत होगी। विश्व के अनेक उन्नत देशों समेत भारत, चीन आदि में 5जी टेक्नोलॉजी दस्तक दे रही है। फिलहाल दुनिया का पहला व्यावसायिक 5जी टेक्नोलॉजी लाने को लेकर विश्व के कई देशों और तकनीकी कंपनियों में होड़ लगी हुई है।
भारत जैसा विकासशील देश भी स्वयं को इस होड़ से दूर नहीं रखना चाहता। वास्तव में 5जी टेक्नोलॉजी से दुनिया भर के आइटी क्षेत्र के विशेषज्ञों को सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक नई क्रांति आने की उम्मीद है। इससे न केवल लोगों को उत्तम नेटवर्क कवरेज मिलेगा, बल्कि जनसंचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, कृषि, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, व्यापार, प्रशासन आदि कई क्षेत्र भी व्यापक रूप से लाभान्वित होंगे।
दरअसल 5जी का मतलब है फिफ्थ जेनरेशन नेटवर्क। इससे पहले 4जी की एलटीई तकनीक ने वर्ष 2010 में दस्तक दी थी। 4जी नेटवर्क की अधिकतम स्पीड अब तक 45 मेगाबिट प्रति सेकेंड रिकॉर्ड की गई है। 5जी में यह स्पीड एक गीगाबिट प्रति सेकेंड तक पहुंच जाएगी। मोटे तौर पर कहें तो 5जी के आने पर हमारे मोबाइल फोन में इंटरनेट 20 गुना तेजी से चलने लगेगा। इससे आप एक हाई डेफिनेशन फिल्म को एक सेकेंड में डाउनलोड कर सकेंगे। 5जी में मुख्य रूप से मिलीमीटर फ्रिक्वेंसी के इस्तेमाल करने की योजना है। फिलहाल हमारे मोबाइल फोन और ज्यादातर इलेक्ट्रोनिक डिवाइसेज छह गीगाहट्र्ज से नीचे की फ्रिक्वेंसी पर चलते हैं। लेकिन इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले उपकरणों की बढ़ती संख्या के कारण यह फ्रिक्वेंसी जाम हो रही है और ओवरलोड का शिकार हो रही है। इसीलिए अब मिलीमीटर फ्रिक्वेंसी के जरिये 30 से 300 गीगाहट्र्ज के खाली फ्रिक्वेंसी बैंड को इस्तेमाल करने की तैयारी है। 5जी टेक्नोलॉजी अल्ट्रा-लो लेटेंसी पर काम करेगी। लेटेंसी वह समय है जो एक डिवाइस से दूसरे डिवाइस में डेटा को भेजने में लगता है। फिलहाल 4जी की लेटेंसी 50 मिलीसेकेंड है, विशेषज्ञों की मानें तो 5जी इसे कम से कम एक मिलीसेकेंड से कम कर देगा। यह ड्राइवरलेस कार, स्मार्ट सिटीज, वचरुअल रियलिटी, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, फैक्टरी रोबोट, ऑनलाइन गेमिंग और बहुत तेज कनेक्टिविटी और रियल टाइम अपडेट जैसी गतिविधियों के लिए बेहद कारगर सिद्ध होगी। 5जी को लेकर दुनिया के अग्रणी तकनीकी देशों में प्रतिस्पर्धा लगी है। इस तकनीक को लेकर चीन और अमेरिका की प्रतिस्पर्धा ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है, मगर अभी तो दक्षिण कोरिया दोनों देशों को इस मामले में पीछे छोड़ रहा है। अक्टूबर 2019 तक दक्षिण कोरिया की तीनों टेलीकॉम कंपनियां- केटी, एसके टेलीकॉम और एलजी यूप्लस गो पूरे देश में 5जी की सर्विस शुरू करने का लक्ष्य लेकर चल रही हैं।
जहां तक भारत का संबंध हैं, तो सरकार को यह विश्वास है कि वर्ष 2020 तक 5जी अपनी पैठ बनाने लगेगा। हालांकि आइटी क्षेत्र के विशेषज्ञों का यह मानना है कि भारत वर्ष 2022 से पहले 5जी को अपने उपभोक्ताओं को एक उत्पाद के तौर पर मुहैया नहीं करा पाएगा। विशेषज्ञ यह सवाल उठाते हैं कि क्या देश की टेलीकॉम कंपनियां 5जी के लिए तैयार हैं? यह सवाल इस लिहाज से लाजिमी है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में अभी भी 4जी के नेटवर्क और इंटरनेट स्पीड को लेकर उपभोक्ता शिकायत करते नजर आते हैं। देश के बहुत से इलाकों में अभी भी बहुत से लोग 2जी और 3जी इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके लिए हाई-स्पीड इंटरनेट आज भी एक कल्पना से कम नहीं है।
अनेक संबंधित विशेषज्ञ भी भारत में 5जी की राह मुश्किलों से भरा मानते हैं, और इसके पीछे कई वजहें हैं। पहला, 5जी इंटरनेट चलाने के लिए उपयुक्त इंफ्रास्ट्रक्चर और नए डिवाइसेज विकसित करनी पड़ेंगी। फिलहाल बड़े स्तर पर बन रहे स्मार्टफोन 4जी के लिए ही हैं। ऐसे में मोबाइल निर्माता कंपनियों को 5जी के अनुकूल हैंडसेट्स और एप्लिकेशंस विकसित करनी पड़ेंगी, जिस पर अभी काम की रफ्तार बहुत धीमी है। दूसरा, क्या महज एक-डेढ़ साल के भीतर 5जी को शुरू करने लायक इंफ्रास्ट्रक्चर और सर्विसेज उपलब्ध हो पाएंगी? तीसरा, टेलीकॉम सेक्टर में रिलायंस जियो की एंट्री ने टेलीकॉम कंपनियों की सूरत और सीरत बदल कर रख दी है। महंगे स्पेक्ट्रम, लगभग मुफ्त वॉयस कॉल और बेहद सस्ते डाटा टैरिफ ने कंपनियों की बैलेंस शीट बिगाड़ दी है। वर्तमान स्थिति में अगर 5जी स्पेक्ट्रम के लिए बोलियां मंगाई गईं तो कंपनियां उसमें हिस्सा कैसे लेंगी? वैसे भी कर्ज लेकर स्पेक्ट्रम के लिए लगाई गई बोली का इतिहास बहुत अच्छा नहीं रहा है। टेलीकॉम विशेषज्ञ आशुतोष सिन्हा मानते हैं कि 5जी टेक्नोलॉजी के लिए भारी निवेश करने से शायद भारतीय कंपनियां बचें। वे कहते हैं, ‘भारतीय टेलीकॉम बाजार बेहद प्रतिस्पर्धी हो गया है। कंपनियां मुनाफा नहीं कमा पा रही हैं। ऐसे में नई तकनीक में निवेश करना कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।’ चौथा, पिछली दूरसंचार तकनीकों की तुलना में 5जी को लेकर सेहत से जुड़ी अनेक आशंकाएं भी हैं। इसकी प्रमुख वजह यह है कि 1जी, 2जी, 3जी और 4जी की तुलना में 5जी के तरंगों की फ्रीक्वेंसी बहुत ज्यादा है। ज्यादा फ्रीक्वेंसी वाली तरंगें सजीवों को बुरी तरह प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि जब तक 5जी के खतरों की सही जांच नहीं हो जाती, तब तक हमें इसे नहीं अपनाना चाहिए।
विशेषज्ञों की मानें तो भारत को इन चुनौतियों से निपटने में वर्ष 2024 तक का समय लग सकता है। बहरहाल बीएसएनएल यानी भारत संचार निगम लिमिटेड देश में 5जी कॉरिडोर बनाने की तैयारी कर रहा है, जिसके माध्यम से 5जी टेक्नोलॉजी के व्यावसायिक रोडमैप को तैयार किया जा सकता है।