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समझौतों का लाभ लेने के लिए तैयार हो भारत

(हर्ष बी पन्त )

(प्रो. इंटरनेशनल रिलेशन्स, किंग्स कॉलेज, लंदन )

(साभार दैनिक भास्कर )

    इस साल की आसियान बैठक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) समझौते को नकारने के लिए याद की जाएगी। इस बैठक में आसियान के 10 सदस्य देशों के साथ ही उसके छह मुक्त व्यापार सहयोगी, चीन, भारत, दक्षिण कोरिया, जापान, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया शामिल थे। बैंकॉक में आरसीईपी की बैठक में मोदी ने कहा कि भारत शुरुआत से ही इसके साथ शामिल है, लेकिन समझौते का ड्राफ्ट आरसीईपी की मूल भावना और तय सिद्धांतों को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करता है। और तो और यह भारत के लंबित मुद्दों और चिंताओं का भी वाजिब समाधान नहीं करता है। आरसीईपी पर बातचीत 2012 में शुरू हुई थी और इस साल इसे अंतिम रूप देने का भारी दबाव था। भारत द्वारा इसे नकारने के बाद बचे हुए 15 देशों ने इस पर आगे बढ़ने का फैसला किया और अगले साल किसी समय इस व्यापार समझौते पर दस्तखत करने का इरादा जाहिर किया है। साथ ही भविष्य में किसी भी समय भारत के इसमें शामिल होने का रास्ता भी खुला रखा है।

    अमेरिका से व्यापार के मसले पर तनाव की वजह से चीन चाहता था कि आरसीईपी एक सफल मुकाम पर पहुंच जाए। वह इसके लिए जबरदस्त तरीके से कोशिश भी कर रहा था। लेकिन, यहीं पर भारत के लिए समस्या थी। भारत की मांग थी कि आरसीईपी में टैरिफ में कटौती के लिए आधार वर्ष को 2014 की बजाय 2019 किया जाना चाहिए, ताकि चीन से बड़ी मात्रा में होने वाली आयात वृद्धि को रोका जा सके। इसके अलावा चीन से डंपिंग को रोकने व समझौतों में बेहतर सेवाओं के लिए भारत कड़े कानून चाहता था। लागत और लाभ का अनुमान लगाने के लिए चीन फैक्टर भारत के लिए प्रमुख था। आरसीईपी के इन 15 देशों में से 11 के साथ भारत का कुल 105 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है और इसमें से 53 अरब डॉलर अकेले चीन के साथ है। चीन अपने निर्माण उद्योग के लिए भारत के बाजार में बड़ी पहुंच चाहता है और भारत अपने उद्योगों और किसानों को चीनी आयात से बचाना चाहता है।

    घरेलू स्तर पर भी इस समझौते का विरोध हो रहा था। किसान, डेयरी उद्योग और कॉरपोरेट सेक्टर इसके खिलाफ थे। सात साल पहले आरसीईपी वार्ता में शामिल होने का फैसला करने वाली कांग्रेस भी अब इसके खिलाफ थी। भारतीय अर्थव्यवस्था में हो रही मुश्किलों ने सरकार की समस्याओं को और बढ़ा दिया था। अगर वैश्विक बातचीत दो स्तरीय खेल था तो भारत को दोनों ही स्तरों से गंभीर चुनौती मिल रही थी, जिस वजह से इस समझौते को नकारना जरूरी हो गया था। अगर यह समझौता हो जाता तो दुनिया की आधी आबादी, 40 फीसदी व्यापार और 35 प्रतिशत जीडीपी के साथ आरसीईपी दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार क्षेत्र होता। भारत इसमें तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होता। भारत के बिना आरसीईपी उतना आकर्षक व्यापार समझौता नहीं रह गया है। इसलिए यह चौंकाने वाला नहीं है कि भारत के बिना आरसीईपी पर आगे बढ़ने को लेकर आसियान में भी मतभेद उभर आए हैं। भारत द्वारा आरसीईपी से अलग रहने के फैसले से निश्चित तौर पर क्षेत्र में भारत की लंबी योजना को लेकर चिंता हो रही है। अगर, भारत ने क्षेत्र में अपनी भूमिका को फिर से बनाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया तो नई दिल्ली की पूरी हिंद-प्रशांत नीति पर ही सवाल उठ सकते हैं।

    भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक तौर पर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन अब दबदबा कायम करने को तैयार दिख रहा है और यह पूरे क्षेत्र व भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है। यही वजह है कि जापान कह रहा है कि वह ऐसे समझौते के लिए काम करेगा, जिसमें भारत भी शामिल हो। चीन द्वारा जल्द समझौते के दबाव के बावजूद जापान के वाणिज्य मंत्री हिरोशी काजीयामा ने दो टूक कहा कि टोक्यो चाहता है कि भारत सहित सभी 16 देश किसी समझौते पर पहुंचंे और वे इसके लिए भूमिका निभाना चाहते हैं। आर्थिक तौर पर अलग-थलग रहना भारत के लिए भी कोई विकल्प नहीं है, इसीलिए वह द्विपक्षीय समझौतों की ओर बढ़ रहा है। भारत को इस तरह के समझौतों का लाभ लेने के लिए खुद को पूरी तरह तैयार करना होगा। घरेलू सुधार वक्त की जरूरत है। भारत को ऐसी रणनीति की जरूरत है, जो उसकी कूटनीतिक सोच के आर्थिक व राजनीतिक पहलुओं को साथ ला सके। आरसीईपी को नकारकर भारत ने संकेत दे दिया है कि हर कीमत पर राजनीतिक और आर्थिक रूप से चीन के उभार से निपटेगा। पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाकी देश भारत के कदम का कैसा जवाब देते हैं, उससे ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन का भविष्य निर्धारित होगा।

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