| क्रम संख्या | लोकोक्ति | अर्थ |
| 360 | यहाँ परिन्दा भी पर नहीं मार सकता | जहाँ कोई आजा न सके |
| 361 | रस्सी जल गयी पर ऐंठन न गयी | बुरी हालत में पड़कर भी अभियान न त्यागना |
| 362 | रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी | कारण का नाश कर देना |
| 363 | रात गई बात गई | अवसर निकल जाना |
| 364 | रात छोटी कहानी लम्बी | समय थोड़ा है और काम बहुत है। |
| 365 | राम मिलाई जोड़ी एक अंधा एक कोढी | दो मनुष्यों के एक ही तरह का होना |
| 366 | राम राम जपना पराया माल अपना | ढोंगी मनुष्य |
| 367 | रोग का घर खाँसी झगड़े घर हाँसी | अधिक मजाक बुरा |
| 368 | रोज कुआँ खोदना रोज पानी पीना | नित्य कमाना और नित्य खाना |
| 369 | रोजा बख्शवाने गए थे नमाज गले पड़ गई | छोटे काम से जान छुड़ाने के बदले बड़ा काम गले पड़ जाना |
| 370 | रोटी खाइए शक़्कर से दुनिया ठगिए मक्कर से | आजकल फ़रेबी लोग ही मौज उड़ाते हैं |
| 371 | लकड़ी के बल बंदरी नाचे | शरारती से शरारती या दुष्ट लोग भी डंडे के भय से वश में आ जाते हैं। |
| 372 | लकीर के फकीर | पुरानी परम्पराओं और रीतिरिवाजों का पालन करने वाला |
| 373 | लगा तो तीर नहीं तो तुक्का | काम बन जाए तो अच्छा है नहीं बने तो कोई बात नहीं |
| 374 | लश्कर में ऊँट बदनाम | दोष किसी का बदनामी किसी की |
| 375 | लाख जाए पर साख न जाए | धन व्यय हो जाए तो कोई बात नहीं पर सम्मान बना रहना चाहिए |
| 376 | लाठी टूटे न साँप मरे | किसी की हानि हुए बिना स्वार्थ सिद्ध हो जाना |
| 377 | लातों के भूत बातों से नहीं मानते | दुष्ट प्रकृति के लोग समझाने से नहीं मानते |
| 378 | लाल गुदड़ी में नहीं छिपता | मेधावी लोग दीनहीन अवस्था में भी प्रकट हो जाते हैं। |
| 379 | लालच बुरी बला | लालच से बहुत हानि होती है इसलिए हमें कभी लालच नहीं करना चाहिए |
| 380 | लूट में चरखा नफा | मुफ्त में जो हाथ लगे वही अच्छा |
| 381 | लेना एक न देना दो | किसी से कुछ मतलब न रखना |
| 382 | लेनादेना साढ़े बाईस | सिर्फ मोलतोल करना |
| 383 | लोभी गुरु और लालची चेला दोऊ नरक में ठेलम ठेला | लालच बहुत बुरी चीज है |
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