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महिला वोटर तो बढ़ीं पर उम्मीदवारी कब बढ़ेगी?

(यामिनी अय्यर)

(सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की प्रेसिडेंट)

(साभार दैनिक भास्कर )

    भारत अगले दो महीनों में एक नई सरकार चुनने के लिए तैयार है लेकिन, इस बीच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि कोई भी राजनेता महिलाओं के मुद्दों से बच नहीं सकता है। डॉ. प्रणय रॉय और दोराब सोपारीवाला की किताब 'द वर्डिक्ट' के मुताबिक 1962 में वोट देने वाली महिलाएं 47% थीं। 2014 में यह बढ़कर 66% हुईं, जबकि इस दौरान पुरुष वोटर केवल पांच प्रतिशत बढ़े। महिला वोटरों की बढ़ती संख्या महिला-पुरुष वोटरों के बीच के गैप को भरने में महत्वपूर्ण साबित हुई। राजनीतिक विशेषज्ञ मिलन वैष्णव और जेमी हिंस्टन द्वारा जुटाए अांकड़ों के अनुसार 1967 में महिला वोटर पुरुष वोटर से 11.3 प्रतिशत से पीछे थीं। 1984 के अपवाद के बावजूद 2004 तक महिला वोटरों की संख्या में बदलाव नहीं हुआ। 2004-2009 के बीच पुरुष-महिला वोटर का अंतर 8.4 से गिरकर 4.4 प्रतिशत हो गया और 2014 में यह घटकर 1.8 प्रतिशत पर आ गया। कई राज्यों में महिला वोटर पुरुष वोटर से अधिक हो गए। 2019 के चुनाव में महिला वोटरों की संख्या अौर बढ़ सकती है। हाल ही में चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार महिला मतदाताअों के नामांकन में काफी वृद्धि हुई है। भारत में महिला मतदाताओं की संख्या 2014 के 47% से बढ़कर 2019 में 48.13% हो गई है। खास बात यह है कि 4.35 करोड़ नए नामांकनों में आधे से ज्यादा महिला वोटरों के हैं। महिला वोटरों के नामांकन में अग्रणी राज्यों में यूपी (54 लाख), महाराष्ट्र (45 लाख), बिहार (42.8 लाख), पश्चिम बंगाल (42.8 लाख), तमिलनाडु (29 लाख) शामिल हैं। जाहिर है कि महिलाएं 2019 में देश की नई सरकार बनाने में पहले के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका में होंगी। राजनेता भी महिला वोटरों के महत्व को जल्दी ही समझ गए। पिछले कुछ सालों से राजनीतिक दल नई योजनाओं और कार्यक्रमों से महिला मतदाता को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। उज्ज्वला, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, सौभाग्य जैसी कई योजनाएं इसका उदाहरण हैं। गरीब महिलाओं को एलपीजी गैस कनेक्शन देने वाली उज्ज्वला योजना के बारे में कहा जाता कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को जीत दिलाने के पीछे इस योजना का महत्वपूर्ण योगदान है। महिला मतदाताओं पर एनडीए का फोकस इसलिए भी बढ़ा, क्योंकि ज्यादातर महिलाओं का झुकाव कांग्रेस की तरफ था। दिल्ली स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज के लोकनीति प्रोग्राम द्वारा आयोजित एक सर्वे के मुताबिक महिला वोटरों के मामले में भाजपा हमेशा कांग्रेस से दो से तीन अंकों से पीछे रहती है। आने वाले कुछ दिनों में राष्ट्रीय चुनाव अभियान के दौरान भाजपा महिला वोटरों पर ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास कर सकती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है कि मुझे वॉट्सएप पर एक वीडियो मिला, जिनमें एनडीए सरकार द्वारा महिलाओं की आजीविका के अवसरों में सुधार के लिए किए प्रयासों का वर्णन था जैसे 'अाजीविका' जो गरीब महिलाओं को कौशल, ऋण व बाजार तक पहुंच व अन्य तरह की सुविधाएं देती है ताकि वे छोटे उद्यम विकसित कर सकें। निश्चित ही एनडीए कांग्रेस की ओर महिलाओं के रुझान को अपने पक्ष में बदलना चाहता है। हमारे नेताओं ने महिला वोटरों के महत्व को पहचानना शुरू कर दिया है लेकिन, क्या इस तरह की योजनाएं और कार्यक्रम वास्तव में बदलाव ला सकते हैं? क्या इससे महिलाओं की आवाज बुलंद हुई है? अफसोस की बात है कि हम सपनों की इस दुनिया से बेहद दूर हैं। आज भी ज्यादातर नेता महिलाओं को वोट बैंक से ज्यादा कुछ नहीं समझते हैं, जिन्हें कुछ योजनाओं और मुफ्त की चीजों से आकर्षित किया जा सकता है। यह उनकी बयानबाजी और काम दोनों से साफ जाहिर होता है कि महिला 'सशक्तीकरण' उज्ज्वला, आजीविका, स्वच्छ भारत, शिक्षा कार्यक्रमों तक ही सीमित है। मैंने अभी तक किसी राजनेता को सामाजिक मूल्यों और मानदंडों में संरचनात्मक बदलाव लाने वाले दृष्टिकोण के बारे में बात करते हुए नहीं सुना। लेबर फोर्स में महिलाओं की भागीदारी की अभूतपूर्व गिरावट आज भारतीय महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, भारत महिला श्रम शक्ति की भागीदारी में 131 देशों में से 121 रैंक पर है। स्टडी से यह पता चलता है कि महिलाओं के बीच बढ़ती काम की मांग के बावजूद उनकी भागीदारी में यह गिरावट है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए श्रम कानूनों में सुधार, व्यावसायिक प्रशिक्षण, जेंडर बेस्ड कोटा और बच्चों की देखभाल की सुविधाओं के लिए बनी नीतियों में बदलाव की जरूरत है। लेकिन इन महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान हटाकर सभी राजनीतिक दलों ने इसे योजनाओं में समेटकर रख दिया है। स्टडी से पता चलता है कि सामाजिक मानदंड महिलाओं को श्रम बाजार से बाहर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। राजनीतिक दलों को इन चुनौतियों का सामना करना चाहिए। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मतदाता वर्ग होने के बावजूद राजनीतिक पदों पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व की कमी है। राजनीतिक पदों पर अगर महिलाओं का प्रतिनिधित्व हो तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों में प्राथमिकता से बदलाव होता है। 2014 में महिला वोटरों की संख्या में तेजी से बदलाव हुआ लेकिन, लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या केवल 11% थी। बेशक, यह एक महत्वपूर्ण सुधार है, लेकिन महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए पर्याप्त नहीं है। महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व का एक बड़ा कारण महिला उम्मीदवारों की कम संख्या है। मिलन वैष्णव के मुताबिक 1962 से 1996 के बीच कुल उम्मीदवारों में से महिला उम्मीदवार 5% से अधिक नहीं थीं। पिछले कुछ सालों में यह मामूली रूप से बढ़ा है। पिछले दिनों में दो क्षेत्रीय दलों, बीजेडी और टीएमसी ने 2019 के चुनावों के लिए महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाने के लिए कदम उठाए हैं। यह एक अच्छी शुरुआत है, बीजेपी और कांग्रेस को भी ऐसे कदम उठाने चाहिए।

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