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(साभार दैनिक जागरण )
पिछले दिनों विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों की नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था करनेवाले 200 प्वाइंट रोस्टर बनाम 13 प्वाइंट रोस्टर का विवाद अखबारों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया में छाया रहा। दरअसल अप्रैल 2017 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की दो सदस्यों वाली एक पीठ ने विश्वविद्यालय को इकाई मानकर आरक्षण की जगह विभागवार आरक्षण का फैसला सुनाया था। दूसरे शब्दों में कहें तो इस फैसले ने विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों में उस समय अपनाए जा रहे 200 प्वाइंट रोस्टर की जगह 13 प्वाइंट रोस्टर की व्यवस्था कर दी। इस आदेश के तहत यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने पांच मार्च 2018 को सभी विश्वविद्यालयों को चिट्ठी लिखकर विभागवार आरक्षण को लागू करने का निर्देश दे दिया। इसके बाद देश भर में 13 प्वाइंट रोस्टर का व्यापक विरोध शुरू हो गया। इस फैसले से न सिर्फ विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हजारों शिक्षकों की नौकरी खतरे में पड़ गई, बल्कि इसने सामाजिक न्याय के सवाल को एक बार फिर केंद्र में ला दिया। इस 13 प्वाइंट रोस्टर के विरोध में एक साल तक चले आंदोलन के दौरान केंद्र सरकार ने दो बार उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, मगर दोनों ही बार उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार की अपील को खारिज करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा। आखिरकार रोस्टर के मुद्दे को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनते देख केंद्र सरकार बीते सात मार्च को 200 प्वाइंट रोस्टर की पुरानी व्यवस्था को बहाल करने के लिए अध्यादेश लेकर आई।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के द्वारा सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की गई है। इसमें कहा गया है ‘इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से नहीं रोकेगी।’ इस अनुच्छेद की भाषा पर गौर करें, तो इसका मकसद स्पष्ट तौर पर राज्य की सेवाओं में पिछड़े वर्गो का ‘प्रतिनिधित्व’ सुनिश्चित करना है। प्रतिनिधित्व का सवाल लोकतंत्र को सच्चा और समावेशी बनाने के सवाल से जुड़ा है।
बाबा साहब भीम राव अंबेडकर ने संविधान सभा में अपने समापन भाषण में राजनीतिक लोकतंत्र के लिए सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना को जरूरी माना था। 25 नवंबर 1949 को दिए गए अपने भाषण में भारत के भविष्य पर चिंता प्रकट करते हुए उन्होंने कहा था, ‘26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों के युग में दाखिल होंगे। राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक मत के सिद्धांत को मान्यता देंगे, लेकिन अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम अपने सामाजिक और आर्थिक बनावट के कारण एक व्यक्ति एक मूल्य को नकारेंगे। हम कब तक अंतर्विरोधों का यह जीवन जीते रहेंगे? हम कब तक अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में सबको समानता देने से इन्कार करते रहेंगे? अगर हम लंबे समय तक ऐसा करते रहे, तो अपने राजनीतिक लोकतंत्र को ही खतरे में डालेंगे।’ दरअसल सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था का मकसद प्रतिनिधित्व के रास्ते से इसी समानता को सुनिश्चित करके लोकतंत्र को मजबूत करना है।
हकीकत यह है कि विश्वविद्यालयों में समाज के सभी वर्गो का समुचित प्रतिनिधित्व अभी तक सुनिश्चित नहीं किया जा सका है। मानव संसाधन विकास मंत्रलय द्वारा वर्ष 2017-18 के लिए उच्च शिक्षा को लेकर कराए गए एक सर्वेक्षण से इस बात का खुलासा हुआ कि उच्च शिक्षण संस्थानों में कार्यरत 12,84,000 शिक्षकों में अनुसूचित जाति (एससी) का प्रतिनिधित्व महज 8.6 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति (एसटी) का प्रतिनिधित्व महज 2.27 प्रतिशत है। जबकि एससी के लिए 15 प्रतिशत और एसटी के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। विभागवार आरक्षण या 13 प्वाइंट रोस्टर संबंधी इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश एससी, एसटी के प्रतिनिधित्व को और कम कर देनेवाला था। इसका सबसे नकारात्मक असर एसटी उम्मीदवारों पर पड़ता। विश्वविद्यालय में नौकरी पाने के लिए उनकी बारी आने में एक सदी से ज्यादा का समय लग जाता।
रोस्टर नौकरियों में सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए भरे जानेवाले पदों का क्रम है। सात अप्रैल 2017 को दिए गए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले से पहले विश्वविद्यालयो में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए 200 प्वाइंट रोस्टर के तहत आरक्षण की व्यवस्था चल रही थी। यह रोस्टर 2006 में अस्तित्व में आया था। इसके तहत विवि को एक इकाई माना गया था। एक से 200 पद के लिए 49.5 फीसद आरक्षित वर्ग और 50.5 फीसद अनारक्षित या सामान्य वर्ग के हिसाब से भर्ती की व्यवस्था की गई थी। उदाहरण के लिए माना जाए कि छह विभागों में कुल 30 रिक्तियां हों, तो पहली, दूसरी, तीसरी सीट सामान्य, चौथी अन्य पिछड़ा वर्ग, पांचवीं, छठी सामान्य, सातवीं एससी, आठवीं ओबीसी, नौवीं, 10वीं, 11वीं सामान्य, 12वीं ओबीसी, 13वीं सामान्य, 14वीं एसटी, 15वीं एससी, 16वीं ओबीसी, 17वीं, 18वीं सामान्य, 19वीं ओबीसी, 20वीं एससी के क्रम से आवंटित की जाती थी। इसके तहत 28वां पद फिर से अनुसूचित जनजाति को जाता था। इस व्यवस्था के तहत 30 सीटों में सामान्य को 16, ओबीसी को आठ, एससी को चार और एसटी को दो सीटें मिलतीं।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा ‘विवेकानंद तिवारी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ के केस में सात अप्रैल 2017 के जस्टिस विक्रम नाथ और दयाशंकर तिवारी की बेंच द्वारा विभागवार आरक्षण के पक्ष में फैसला सुनाया गया। विभागवार या विषयवार आरक्षण के विभाग को इकाई माना जाता है और आरक्षण देने के लिए 13 प्वाइंट रोस्टर की व्यवस्था को अपनाया जाता है। इस 13 प्वाइंट रोस्टर के तहत रिक्तियों में आरक्षण देने का क्रम इस प्रकार होता है। पहला, दूसरा और तीसरा पद सामान्य वर्ग के लिए। चौथा ओबीसी के लिए, पांचवां और छठा फिर से सामान्य वर्ग के लिए। सातवां पद अनुसूचित जाति के लिए, आठवां पद ओबीसी, नौवां, 10वां, 11वां पद सामान्य वर्ग के लिए, जबकि 12वां पद ओबीसी के लिए, 13वां पद फिर सामान्य वर्ग के लिए और 14वां पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित होता है।
आरक्षण का मुख्य उद्देश्य सरकारी नौकरियों में सभी वर्गो का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। विभागवार या 13 प्वाइंट रोस्टर के तहत आरक्षण की व्यवस्था आरक्षण के इस मूल उद्देश्य के साथ ही खिलवाड़ करने वाला था। इसे ऊपर के उदाहरण से ही समझा जाए, तो अगर छह विभागों में आई रिक्तियों को 13 प्वाइंट रोस्टर से भरा जाता, तो ओबीसी को छह सीटें मिलतीं, मगर एससी और एसटी के खाते में एक भी सीट नहीं जाती। अधिकांश मामलों में ओबीसी को मिलनेवाली सीटों की भी संख्या वास्तव में और कम होती और एससी, एसटी का प्रतिनिधित्व लगभग शून्य हो जाता। विभाग को इकाई मानने पर हर आरक्षित वर्ग से एक नियुक्ति के लिए कम से कम 14 रिक्तियां जरूरी है। विभागों के छोटे आकार के कारण यह लगभग नामुमकिन शर्त है। नियुक्ति का एक पूरा चक्र पूरा हो भी जाए, तो भी 37.5 प्रतिशत आरक्षण की ही व्यवस्था होती है, जो संविधान द्वारा तय 49.5 प्रतिशत से कम है। 200 प्वाइंट रोस्टर का फायदा यह है कि अगर किसी विभाग में प्रतिनिधित्व कम रह जाता है, तो उसकी भरपाई दूसरे विभाग से हो जाती है।
वास्तव में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के बाद विश्वविद्यालयों में जो भी भर्तियां निकलीं, उनसे ये आशंकाएं सच साबित हुईं। अप्रैल 2018 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय के लिए आईं 52 रिक्तियों रिक्तियों में अनारक्षित के हिस्से में 51 सीटें गईं। यही हाल हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय का था, जहां आई 80 रिक्तियों में एक भी सीट आरक्षित नहीं थी। दरअसल पिछले एक साल में विभिन्न संस्थानों में आए रिक्तियों के विज्ञापनों ने 13 प्वाइंट रोस्टर में छिपे अन्याय को उजागर करने का काम किया।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के सवाल पर यूपीए सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रलय ने दिसंबर 2005 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को चिट्ठी भेजकर विश्वविद्यालयों में आरक्षण के प्रभावशाली क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। इस पर यूजीसी ने प्रोफेसर रावसाहब काले की अध्यक्षता में आरक्षण को लेकर एक फॉमरूला बनाने के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। काले समिति ने डीओपीटी के दो जुलाई 1997 के दिशानिर्देश को, जो कि उच्चतम न्यायालय के सब्बरवाल फैसले के आधार पर तैयार हुआ था, आधार मानते हुए 200 प्वाइंट का रोस्टर बनाया। इसमें किसी विश्वविद्यालय के सभी विभाग में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर का तीन स्तर पर कैडर बनाने की सिफारिश की गई। समिति कमेटी ने विभाग की जगह विश्वविद्यालय, कॉलेज को इकाई मानकर आरक्षण लागू करने की सिफारिश की।
राजनीतिक विरोध को देखते हुए 11 फरवरी 2019 को केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने यह वादा किया था कि 13 प्वाइंट रोस्टर को लागू नहीं किया जाएगा और केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय में एक बार फिर पुनर्विचार याचिका दायर करेगी और जरूरत पड़ने पर अध्यादेश लाएगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 28 फरवरी को पुनर्विचार याचिका को खारिज कर देने के बाद केंद्र सरकार ने 200 पॉइंट रोस्टर को बहाल करने के लिए ही आखिरकार अध्यादेश लाने का फैसला किया।