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घाटी को विकास व राजनीति दोनों की जरूरत है

(निसार अली) (पूर्व सदस्य, जम्मू-कश्मीर वित्त आयोग)

(साभार हिंदुस्तान )

    जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद दो महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है- पहला विकास और दूसरा राजनीति। फिलहाल राज्य में राजनीतिक प्रक्रिया थम गई है। जम्मू-कश्मीर में राजनीति की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है। यहां मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के भी ठीक वैसे ही अपने एजेंडे हैं, जैसे राष्ट्रीय पार्टियों के हैं। जब अनुच्छेद 370 हटाया गया, तब ये सारे एजेंडे साफ हो गए। ऐसे में, कश्मीर में हर सियासी पार्टी के सारे राजनीतिक खेलों पर विराम लग गया। जहां तक इस क्षेत्र के पुनर्गठन के भविष्य का प्रश्न है, तो उठी गर्द को शांत होने में कम से कम दो वर्ष लग जाएंगे, क्योंकि इस राज्य का केवल भौगोलिक विभाजन ही नहीं हुआ है। कानूनों को बदलना होगा, बदलाव के अनुरूप संशोधन करने पड़ेंगे। प्रशासन का पुनरोद्धार करना होगा। दूसरे सुधारों के साथ ही शासन को भी दुरुस्त करना होगा। कश्मीर के लिए बदलाव के ये दो वर्ष बहुत निर्णायक होंगे, वह अब राज्य नहीं है, पूर्ण केंद्रशासित क्षेत्र में बदल गया है।

    जहां तक विकास की बात है, तो अनुच्छेद 370 के खत्म होने के बाद भारत के कॉरपोरेट क्षेत्र और बड़े उद्यमियों की मानसिकता अगर बदल गई है, तो उन्हें कश्मीर में निवेश करने के लिए रास्ता तैयार करने की जरूरत है। अगर निजी क्षेत्र का निवेश और केंद्र सरकार द्वारा मूलभूत ढांचे में निवेश बढ़ता है, तो कश्मीर का कायाकल्प हो जाएगा। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने भी कश्मीर को पर्यटन का स्वप्न लोक बनाने के बारे में सोचा था। निजी क्षेत्र और सरकार ने मिलकर अगर प्रयास किया, तो ऐसे कश्मीर का सपना साकार हो जाएगा। यह मूल रूप से इंगित करता है कि निवेश का एक सामूहिक प्रयास और पर्यटन में उछाल से यह सुनिश्चित होगा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में समृद्धि आए। ऐसा हुआ, तो इससे न केवल यहां आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी, बल्कि रोजगार सृजन को भी काफी बढ़ावा मिलेगा।     विकास के अलावा हमें घाटी में उग्रवाद की समस्या पर भी ज्यादा गौर करने की जरूरत है। पिछले कुछ-कुछ वर्षों में अलग-अलग वार्ताओं में तीन सेना प्रमुखों ने यह कहा है कि उन्होंने ‘अपना काम’ कर दिया है और अब सरकार को इस मुद्दे से राजनीतिक रूप से निपटना है। अब नए परिदृश्य में भारत सरकार को कदम उठाने और यह पता लगाने की आवश्यकता है कि इस स्थिति से कैसे निपटा जाए? इसका हमें ध्यान रखना चाहिए कि उग्रवाद का स्थानीयकरण अब भी जारी है। हां, इतना जरूर है कि आतंकवाद अब दक्षिण कश्मीर तक ही सीमित हो गया है और 1990 के मुकाबले इसकी तीव्रता में भी कमी आई है। पाकिस्तान के मुकाबले के लिए केंद्र सरकार का जो नजरिया है, उसकी एक अलग कहानी है, लेकिन अभी इस क्षेत्र के पुनर्गठन के बाद हमें अपना फोकस इस बात पर रखना चाहिए कि स्थानीय आतंकवाद से कैसे निपटा जाए।

    वैसे एक और महत्वपूर्ण कारक है, जिस पर केंद्र सरकार को पहले ध्यान देना चाहिए। आखिर कश्मीर में लोग अलगाव की भावना को क्यों महसूस करते हैं? आज लाखों लोग खुद को अलग-थलग पा रहे हैं और यह भावना उनमें अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद बढ़ी है। अनुच्छेद 370 का जो एक खास एहसास था, वह खत्म हो गया है। नतीजतन, अलगाव बढ़ गया है। यह पहली और महत्वपूर्ण चुनौती है, इस पर ध्यान देना केंद्र सरकार के लिए जरूरी है। अलगाव की इस भावना को केंद्र सरकार कैसे दूर करती है, स्थिति को कैसी संभालती है, यह स्वयं सरकार को तय करना है।

    विकास की नई शुरुआत और आतंकवाद की समाप्ति से जुड़ी अनेक आकांक्षाएं हैं। अगर सरकार जम्मू-कश्मीर में मूलभूत ढांचा निर्माण की परियोजनाएं बड़े पैमाने पर चलाना चाहती है, अगर कश्मीर में बड़े पैमाने पर सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की योजना बना रही है, तो जाहिर है, यहां बहुत सारे रोजगार पैदा होंगे। इससे निश्चित रूप से लोगों के दिलों में पनपे अलगाव का इलाज होगा। उन्हें यह एहसास कराना होगा कि वे अलग नहीं हैं। लोगों तक पहुंचना होगा। उनका विश्वास हासिल करने की शुरुआत तो करनी पड़ेगी और यह सब भारत सरकार की इस क्षेत्र और खासकर कश्मीर से जुड़ी नीतियों पर निर्भर करेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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