NAUKARIPAO.COM
(अभिजीत)
जब हम "भारत के लोग" अपना नया स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, बाबा नागार्जुन की एक प्रसिद्ध कविता का वह सवाल पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो गया है, जिसमें पहले वे पूछते हैं : किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है? बाबा अपने सवाल को कौन त्रस्त, कौन पस्त और कौन मस्त तक भी ले जाते हैं, तो लगता है कि उन्हें आज की तारीख में हमारे सामने उपस्थित विकट हालात का पहले से इल्म था।इन हालात की विडम्बना देखिए : एक ओर तो अब हमारे नेता देश को समता, स्वतंत्रता और न्याय पर आधारित संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का 26 नवम्बर, 1949 को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित संकल्प को संविधान की पोथियों में भी चैन से नहीं रहने देना चाहते; और दूसरी ओर गैर-बराबरी का भस्मासुर न सिर्फ हमारी बल्कि दुनिया भर की जनतांत्रिक शक्तियों के सिर पर अपना हाथ रखकर उन्हें धमकाने पर आमादा है कि लोकतंत्र की अपनी परिकल्पनाओं को लेकर किसी मुगालते में न रहें। अमीरी का जाया यह असुर उनके सारे के सारे मूल्यों को तहस-नहस करने का मंसूबा लिए उन्मत्त होकर आगे बढ़ा आ रहा है, और आरजू या मिनती कुछ भी सुनने के मूड में नहीं है। अभी जब हम अपना पिछला गणतंत्र दिवस मनाने वाले थे, गरीबी उन्मूलन के लिए काम करने का दावा करने वाले ऑक्सफेम इंटरनेशनल ने एक सर्वेक्षण में बताया गया था कि आर्थिक विषमता की, जो सभी तरह की स्वतंत्रताओं और इंसाफों की साझा दुश्मन है, दुनिया भर में ऐसी पौ-बारह हो गई है कि पिछले साल बढ़ी 762 अरब डॉलर की संपत्ति का 82 फीसदी हिस्सा एक प्रतिशत धनकुबेरों के कब्जे में चला गया है, अधिसंख्य आबादी को जस की तस बदहाल रखते हुए। इस संपत्ति के रूप में धनकुबेरों ने गरीबी को सात बार सारी दुनिया से खत्म कर सकने का सार्मय इस एक साल में ही अपनी मुट्ठी में कर लिया तो क्या आश्र्चय कि गरीबों के लिए "कर लो दुनिया मुट्ठी में" का अर्थ एक संचार सेवाप्रदाता कंपनी के झांसे का शिकार होना भर हो गया है। तिस पर अनर्थ यह कि 50 प्रतिशत अत्यंत गरीब आबादी को आर्थिक वृद्धि में कतई कोई हिस्सा नहीं मिल पाया है, जबकि अरबपतियों की संख्या बढ़कर 2,043 हो गई है। इनमें 90 फीसदी पुरु ष हैं यानी यह आर्थिक ही नहीं लैंगिक असमानता का भी मामला है, पितृसत्ता के नये सिरे से मजबूत होने का भी। बताने की जरूरत नहीं कि यह अनर्थ भूमंडलीकरण की वर्चस्ववादी नीतियों से पोषित अर्थ नीति का अदना-सा "करिश्मा" है, और यह गरीबों के ही नहीं, बढ़ते धनकुबेरों के प्रतिद्वंद्वियों के लिए भी हादसे से कम नहीं है क्योंकि इन कुबेरों ने यह बढ़त कठिन परिश्रम और नवाचार से नहीं, बल्कि संरक्षण, एकाधिकार, विरासत और सरकारों के साथ साठगांठ के बूते कर चोरी, श्रमिकों के अधिकारों के हनन और ऑटोमेशन की राह चलकर स्पर्धा का बेहद अनैतिक माहौल बनाकर पाई है। निश्चित ही यह इस अर्थनीति की निष्फलता का द्योतक है क्योंकि इन कुबेरों द्वारा संपत्ति में ढाल ली गई पूंजी अंतत: अर्थ तंत्र से बाहर होकर पूरी तरह अनुत्पादक हो जानी है, और उसे इस तय से कोई फर्क नहीं पड़ना कि कई अरब गरीब आबादी बेहद खतरनाक परिस्थितियों में भी ज्यादा देर तक काम करने और अधिकारों के बिना गुजर-बसर करने को मजबूर है। अपने देश की बात करें तो यहां 2017 में उत्पन्न कुल संपत्ति का 73 प्रतिशत हिस्सा ही एक प्रतिशत सबसे अमीरों के नाम रहा है। यह विश्वव्यापी औसत 82 से कम है, लेकिन देश की जिस अर्थव्यवस्था के अभी हाल तक "दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था" होने का दावा किया जाता रहा है, उसमें अमीरों द्वारा सब-कुछ अपने कब्जे में करते जाने की रफ्तार इतनी तेज हो गई है कि 2016 में 58 प्रतिशत संपत्ति के स्वामी एक प्रतिशत अमीरों के कब्जे में अब 73 प्रतिशत संपत्ति है यानी 2017 में उनकी कुल संपत्ति में 20.7 लाख करोड़ की बढ़ोतरी हुई, जो उसके पिछले साल 4.89 लाख करोड़ रु पये ही थी। चूंकि हमने बेरोकटोक भूमंडलीकरण को सिर-माथे लेकर अनेकानेक विदेशी कंपनियों को देश में कमाया मुनाफा देश से बाहर ले जाने की छूट भी दे रखी है, इसलिए विदेशी अरबपतियों को खरबपति बनाने में भी हमारा कुछ कम योगदान नहीं है। ऐसे में यह समझने के लिए अर्थशास्त्र की बारीकियों में बहुत गहरे पैठने की जरूरत नहीं कि यह अमीरी ज्यादा से ज्यादा लोगों को आर्थिक विकास का फायदा देकर यानी "सबका साथ, सबका विकास" के नारे को सदाशयता से जमीन पर उतारकर संभव ही नहीं थी। इसलिए विकास के सारे लाभों को लगातार कुछ ही लोगों तक सीमित रखकर हासिल की गई है। तथाकथित आर्थिक सुधारों के उस मानवीय चेहरे पर अमानवीयतापूर्वक तेजाब डालकर, जिसकी र्चचा 24 जुलाई, 1991 को देश में भूमंडलीकरण की नीतियों का आगाज करते हुए उसके सबसे बड़े पैरोकार तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने की थी। गैर-बराबरी के ये आंकड़े हमारे लिए इस लिहाज से ज्यादा चिंतनीय हैं कि ये हमारे दुनिया का सबसे "महान" जनतंत्र होने के दावे की कनपटी पर किसी करारे थप्पड़ से कम नहीं हैं। इसलिए और भी कि जहां कई अन्य छोटे-बड़े देशों ने भूमंडलीकरण के अनर्थो को पहचानना और उनसे निपटने के प्रतिरक्षात्मक उपाय करना शुरू कर दिया है, हमारे सत्ताधीश कतई किसी पुनर्विचार को राजी नहीं हैं। उन्हें इस सवाल से कतई कोई उलझन नहीं होती कि अगर इस जनतंत्र के सात दशकों का सबसे बड़ा हासिल यह एक प्रतिशत की अमीरी ही है, तो बाकी निन्यानवे प्रतिशत के लिए इसके मायने क्या हैं?बड़े-बड़े परिवर्तनों के दावे करके आई नरेन्द्र मोदी सरकार को भी अपने चार सालों में इस अनर्थ नीति को बदलना गंवारा नहीं है। भले ही यह नीति कम से कम इस अर्थ में तो भारत के संविधान की घोर विरोधी है कि यह किसी भी स्तर पर उसके समता के मूल्य की प्रतिष्ठा नहीं करती और उसके संकल्पों के उलट आर्थिक ही नहीं, प्राकृतिक संसाधनों के भी अंधाधुंध संकेंदण्रपर जोर देती है। यह सरकार इस सीधे सवाल का सामना भी नहीं करती कि किसी एक व्यक्ति के अमीर बनाने के लिए कितनी बड़ी जनसंख्या को गरीबी के हवाले करना पड़ता है, और क्यों हमें "हृदयहीन" पूंजी को ब्रह्म और "श्रम के शोषक" मुनाफे को मोक्ष मानकर "सहृदय" मनुष्य को संसाधन की तरह संचालित करने वाली अर्थव्यवस्था के लिए अनंतकाल तक अपनी सारी लोकतांत्रिक-सामाजिक नैतिकताओं, गुणों और मूल्यों की बलि देते रहना चाहिए? एक ओर इन सवालों के जवाब नहीं आ रहे और दूसरी ओर इन्हें पूछने वाले हकलाने लग गए हैं, तो साफ है कि हमारे लोकतंत्र में जनतांत्रिक विचारों की कमी खतरनाक स्तर तक जा पहुंची है। यह कमी ऐसे वक्त में कोढ़ में खाज से कम नहीं है कि गरीबों को और गरीब और अमीरों को और अमीर बनाने वाली आर्थिक नीति के करिश्मे अब किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। वे ़सारे लाभों को अमीर देशों के लिए सुरक्षित कर उन्हें और अमीर जबकि गरीब देशों को और गरीब बना रही हैं। एक प्रतिशत लोगों की अमीरी की यह उड़ान हमें कितनी महंगी पड़ने वाली है, जानना हो तो बताइए कि गरीबों के लिए इस गैरबराबरी से उबरने की कल्पना भी दुष्कर हो जाएगी तो वे क्या करेंगे? जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल 31 अक्टूबर से 2 नवम्बर तक भारत के दौरे पर आ रही है। यह दौरा वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में एक विशेष महत्त्व रखता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज भारत एक अलग पहचान रखता है और उसके महत्त्व को पूरी दुनिया समझ रही है। भारत की पूछ की एक और वजह यहां का विशाल बाजार भी है। विश्व का हर देश भारत के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना चाहता है और भारत भी आगे बढ़कर उनका स्वागत कर रहा है। इसी कड़ी में एक महत्त्वपूर्ण नाम है जर्मनी का। यूं तो भारत और जर्मनी के संबंध आजादी के समय से ही है, लेकिन वर्तमान समय में इनमें और मजबूती आ गई है। इसमें दोनों देशों के अभी के राजनीतिक नेतृत्व का एक अहम योगदान है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जहां अपने कार्यकाल में चार बार जर्मनी जा चुके हैं, जिसमें एक बार वहां की चांसलर एंजेला मर्केल के बुलावे पर कम देर के लिए लंदन से लौटने में बर्लिन में रु कना भी शामिल है। उसी तरह चांसलर एंजेला मर्केल भी अपने कार्यकाल में तीन बार भारत आ चुकी हैं और यह उनकी चौथी यात्रा है। इस साल जून महीने में जापान के ओसाका शहर में जी-20 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने एंजेला मर्केल से मुलाकात की थी। एंजेला मर्केल 2005 में चांसलर बनी थीं तब से लेकर जर्मनी की कमान उनके हाथों में है। मर्केल यहां पांचवें इंटर-गवर्मेंटल कंसल्टेशन में भाग लेने आ रही हैं। इंटर-गवम्रेटल कंसल्टेशन की शुरु आत 2011 में हुई और 2 साल के अंतराल पर होता है। यह पांचवा इंटर-गवम्रेटल कंसल्टेशन है। इसको शुरू करने का मुख्य उद्देश्य संबंधों की एक व्यापक समीक्षा और सहयोग के नये आयाम ढूंढना है। भारत और जर्मनी के रिश्ते के सात दशक से ज्यादा हो गए है, दोनों देशों के घरेलू स्थिति में काफी उतार-चढ़ाव आए मगर इसका प्रभाव दोनों देशों के संबंधों पर नहीं पड़ा और संबंधों में निरंतरता बनी रही। जर्मनी भारत के नाभिकीय आपूत्तर्ि-कर्ता समूह में सदस्यता का भी समर्थ है। भारत और जर्मनी एक दूसरे के संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का भी समर्थन करता है। वर्ष 2001 में दोनों देशों ने स्ट्रेटेजिक पार्टनिशप से अपने रिश्तों को और मजबूत किया, जिसे वर्तमान समय में इंटर-गवम्रेटल कंसल्टेशन इस दायरे को और बढ़ा रहा है। रक्षा, आर्थिक और अन्य मामलों में भी भारत और जर्मनी साथ में काम कर रहे है। दोनों देशों के बीच व्यापार 17 अरब से ज्यादा का हो चुका है जो की लगातार बढ़ रहा है और जर्मनी यूरोप में भारत का एक महत्त्वपूर्ण और बढ़े व्यापारिक भागीदारी के रूप में उभरा है। इंटर-गवम्रेटल कंसल्टेशन इनमें मजबूती और नये क्षेत्रों में फैलाव का एक प्रभावी जरिया बन गया है। पिछले इंटर-गवम्रेटल कंसल्टेशन के दौरान, जो की बर्लिन में 2017 में हुआ था, दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में 12 नये समझौते हुए थे, जिसमें कौशल विकास, स्वास्थ, शहरी विकास, विज्ञान, इत्यादि शामिल थे। इस बार का इंटर-गवम्रेटल कंसल्टेशन भी अपने साथ नई उम्मीद और संभावनाएं ला रहा है। पांचवें इंटर-गवम्रेटल कंसल्टेशन को लेकर शनिवार को चांसलर एंजेला मैर्केल ने भी ट्वीट किया, जिससे उन्होंने जाहरि किया की वो इस यात्रा लेकर कितनी उत्साहित हैं। आर्थिक एवं व्यापारिक संबंध, जलवायु संरक्षण, सतत विकास और अन्य विषयों पर इस बैठक में बातचीत होनी है और इन क्षेत्रों में समझौते भी हो सकते हैं। जर्मनी तकनीक के क्षेत्र में भी भारत के लिए सहयोगी साबित हो सकता है। 2019 के ग्रुप 20 (जी-20) बैठक के दौरान भी दोनों देशों के नेताओं ने आर्टफिीशियल इंटेलिजेंस, ई-मोबिलिटी, कौशल विकास, रेलवे का आधुनिकरण इत्यादि विषयों पर बातचीत हुई थी। आगे इनपर कुछ ठोस कदम उठने की भी उम्मीद की जा सकती है। ऐसे समय में जब अमेरिका को चीन चुनौती दे रहा है और विश्व में कोई एक नियंतण्र व्यवस्था नहीं है लगभग सभी देश आतंकवाद और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, उस समय विश्व की दो शक्तियों- भारत और जर्मनी का अच्छा संबंध एक सकारात्मक संदेश है। जहां भारत विशेष तौर पर एशिया में एक गहरा प्रभाव रखता है ठीक उसी तरह जर्मनी यूरोप की राजनीति और अर्थव्यवस्था का केंद्रबिंदु है। यह दौरा भारत और जर्मनी के भविष्य को तय करने में एक अहम योगदान तो रखता ही है साथ ही साथ इसका प्रभाव पूरे विश्व पर भी होगा।(RS)