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बदलता समय और जंग लगी प्रणाली

(मोहन भंडारी)( लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड)

(साभार हिंदुस्तान )

    दुनिया में भारत शायद एकमात्र ऐसा देश है, जहां एक संघीय और उसके अलावा समस्त राज्यों में भी सांविधानिक लोक सेवा आयोग हैं। यहां आयोगों की भरमार है। पहली बार 1 अक्तूबर 1926 को लोक सेवा आयोग का गठन हुआ था, जिसकी आज्ञा गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट 1919 द्वारा दी गई थी। लोक सेवा आयोग का प्राथमिक उद्देश्य एक ऐसा पारदर्शी और योग्य प्रतिष्ठान बनाना था, जो पेशेवर और शासकीय सेवाओं के लिए उपयुक्त व्यक्तियों का उनकी दक्षता के आधार पर चयन कर सके। इस चयन प्रणाली को साकार करने के लिए यह सुनिश्चित करना था कि तमाम राष्ट्रीय व राज्य सेवाएं भाई-भतीजावाद और बाहरी प्रभाव से मुक्त रहें। इन तमाम बातों का स्पष्ट उल्लेख ‘नॉर्थकोट’ और ‘त्रेवेलिन’ के उस मशहूर दस्तावेज में भी किया गया था, जो लगभग 160 साल पहले ब्रिटिश गवर्नमेंट को पेश की गई थी। आश्चर्य तो यह है कि आज भी उन सिद्धांतों और उद्देश्यों का इतना ही महत्व है, जितना सर्वप्रथम लोक सेवा आयोग के अस्तित्व में आने पर था। संभवत: यही एक प्रमुख कारण रहा कि संविधान ने 1950 में लोक सेवा आयोगों को एक निश्चित रूप दिया।

    आज एक राज्य के स्तर पर लगभग 70 प्रतिशत संसाधनों और साधन-संपत्ति का उपयोग सिर्फ वेतन और अनेक अन्य प्रशासनिक मदों पर खर्च होता है। यह उल्लेखनीय है कि राज्यों के मानव संसाधन हमारे राष्ट्र की बहुमूल्य संपत्ति हैं। संपूर्ण विश्व में आज भारत सबसे नौजवान राष्ट्र है, जिसकी लगभग 64 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम उम्र की है। यही वह समय है, जब इस नौजवान वर्ग को निश्चित दिशा और दशा देकर हम अपने राष्ट्र को बुलंदी की ओर ले जा सकते हैं। यह भी याद रहे कि यह समीकरण सिर्फ एक पीढ़ी (25-30 साल तक) तक ही सीमित है। संघ और राज्यों के लोक सेवा आयोग इस आयु वर्ग के युवक और युवतियों के भाग्य विधाता हैं। हालांकि यह देखा गया है कि चयनित युवा 30-35 के भी होते हैं।

    यह परम आवश्यक है कि केंद्र और राज्यों के इन सेवा आयोगों को अधिक महत्व दिया जाए, ताकि युवा वर्ग इनका सही उपयोग कर लाभ उठा सके। इन संस्थानों को महत्व न देना स्वर्णिम अवसरों को खो देना है। बदलते परिवेश में सरकारी सेवाओं में बहुत बुनियादी परिवर्तन आए हैं। आज सूचना, प्रबंधन, कौशल इत्यादि में बड़े बदलाव आए हैं। संपूर्ण विश्व आज एक भूमंडलीय गांव बन चुका है, लेकिन भारत के लोक सेवा आयोगों में इस मोर्चे पर बहुत कम काम हुआ है। सब पुराने ढर्रों और तौर-तरीकों पर ही चल रहे हैं।

    अंग्रेजों को गए 72 साल हो गए। आज ब्रिटेन के सिविल सर्विस कमिशन का काम भी सिमट गया है। विश्व के अनेक राष्ट्रों में चयन का उत्तरदायित्व गैर-सरकारी प्रतिष्ठानों को दे दिया गया है। कुछ राष्ट्रों ने चयन प्रक्रिया को मंत्रालयों और विभागों के हवाले कर दिया है। ऐसे विकेंद्रीकरण से हर स्तर पर जिम्मेदारी बढ़ जाती है। भारत में जिम्मेदारी का अभाव है। भारत में बहुत से ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से हम आमूल-चूल परिवर्तन नहीं ला सकते, लेकिन जंग खाई प्रणाली को पटरी पर लाने के प्रयास तो निश्चित रूप से किए जा सकते हैं।

    क्या हम भविष्य में भी सरकारी और राजकीय पदों पर आसीन होने वाले व्यक्तियों का इसी तरह से चयन करते रहेंगे? राष्ट्रमंडल के लगभग सभी देशों में भर्ती की प्रक्रिया बदल चुकी है। क्या भारत चयन प्रक्रिया में बदलाव करेगा? क्या भारत दूसरे सक्षम देशों से इस मामले में मदद लेगा? भारत जैसे विशाल राष्ट्र में जहां नागरिक और प्रबंधन लोकाचार विश्व के अन्य राष्ट्रों से भिन्न है, हमें अपने अनुरूप बदलाव आयोगों में करने पड़ेंगे। परीक्षा प्रारूपों को बुनियादी रूप से बदलना होगा। लिखित परीक्षाओं और साक्षात्कार के दौरान मनोविज्ञान संबंधी प्रश्नों का भी समुचित समावेश करना होगा, ताकि हम कुछ हद तक यह सुनिश्चित कर सकें कि उत्तीर्ण होने वाले युवा मानसिक रूप से अपने लोक सेवा पदों की मर्यादा का ईमानदारी से निर्वाह कर सकेंगे।

    लोक सेवा आयोग कई बार कर्मठता के साथ काम करते हैं, लेकिन उनके मानकों और निर्देशक तत्वों में बदलावों की जरूरत है। उन्हें ज्यादा उत्तरदायी बनाना जरूरी हो गया है। लोक सेवा आयोग अपनी वार्षिक सारणी बनाते हैं, लेकिन आमतौर पर ये सारणियां महज औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। भारत में अभी भी लोक सेवा आयोगों पर जनता का विश्वास तो है, पर धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। इसके लिए सीधे-सीधे केंद्र और राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं। यह देखना होगा कि वे आयोगों को कैसे चला रही हैं। आयोगों का संचालन किन लोगों के हाथों में दे रही हैं? ज्यादातर सरकारी तंत्रों में लोक सेवा आयोगों के प्रति उदासीनता देखी गई है।

    यह दुर्भाग्य है कि अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियों का संविधान में वर्णन तो है, लेकिन उनकी योग्यताओं और चयन पद्धति/प्रणाली के विषय में निर्देश नहीं हैं। फलस्वरूप राजनीति और नौकरशाही हावी हैं। अध्यक्ष और सदस्यों के चुनाव में यह आवश्यक है कि सर्च कमेटियां बनाई जाएं, ताकि योग्यता के आधार पर ही इनका चयन हो सके। आज केंद्र और राज्य सरकारें भी लोक सेवा आयोगों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं, क्योंकि इनका तमाम बजट वही देती हैं। याद रहे कि लोक सेवा आयोग सरकारों के अनुबंध में नहीं हैं, बल्कि स्वतंत्र चयनकर्ता हैं, जिसका स्पष्ट वर्णन संविधान में है। यह अपने आप में सबसे बड़ी कमजोरी है। दूसरी बड़ी कमजोरी तो यह है कि आज राष्ट्र के उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में लोक सेवा में चयन प्रक्रिया के विरुद्ध वादों की भरमार है।

    अब समय की मांग है कि केंद्र सरकार इन कमजोरियों पर उचित ध्यान दे और उच्च स्तर पर बुद्धिजीवियों का एक आयोग बनाए, ताकि जरूरत के मुताबिक संविधान में उचित संशोधन किए जा सकें। याद रहना चाहिए कि भारत का सुशासन इन्हीं चयनित व्यक्तियों पर आधारित रहता है, जो 30-35 वर्षों तक राष्ट्र और राज्यों को अपनी सेवाएं देते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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