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(प्रो. लल्लन प्रसाद)
बीते कुछ माह से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में गिरावट चक्रीय कारकों (साइक्लिकल फैक्टर्स) और मांग में कमी के कारण है। वित्त बाजार में मुद्रा की कमी भी मंदी के कारणों में एक होने के संकेत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख क्रिस्टालिना जार्जीवा ने हाल में दिए हैं। अमेरिका, यूरो क्षेत्र और चीन में अप्रत्याशित आर्थिक गिरावट ने भारत की विकास दर को प्रभावित किया है जो इस वित्त वर्ष में पांच प्रतिशत पर आ गया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने पूर्व अनुमानित 6.9 प्रतिशत विकास दर को इस वित्त वर्ष के लिए 6.1 प्रतिशत पर ला लिया है। नोबेल पुस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति को अत्यंत चिंताजनक बताया है। उनका मानना है कि ऐसी स्थिति वर्षो बाद देखने को मिल रही है, जब गांवों और शहरों दोनों में औसत उपभोग इतने निचले स्तर पर आ गया है। अमेरिका के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के माननीय प्रोफेसर का यह आकलन जमीनी सच्चाई से मेल नहीं खाता दिखता।
हाल के वर्षो में आर्थिक विकास और सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं से भारत में गरीबी रेखा के नीचे 41.6 प्रतिशत से घटकर 23.6 प्रतिशत लोग रह गए हैं। यह विश्व बैंक का अनुमान है। वर्ष 2014 से 2018 तक भारत का औसत विकास दर सात प्रतिशत से अधिक था, जिसने भारत को सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना दिया था। पिछली पांच तिमाहियों से अर्थव्यवस्था में जो गिरावट आई है वह समकालीन आंतरिक एवं बाहरी परिस्थितियों के कारण है। स्थिति उतनी गंभीर नहीं है जितनी बताई जा रही है। अर्थव्यवस्था के आधार (फंडामेंटल्स) मजबूत हैं और उसे पटरी पर लाने के प्रयासों में तेजी लाने की आवश्यकता है।
पिछले कुछ माह के दौरान एफएमसीजी यानी उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में जो कमी आई है इसके अनेक कारण हैं। आटॉमोबाइल और रीयल एस्टेट सेक्टर में भारी गिरावट हुई है। इसका प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। ऑटोमोबाइल उत्पादन में 20 प्रतिशत से अधिक गिरावट का अनुमान है जो मांग में कमी का एक बड़ा कारण है। इस क्षेत्र में लगे लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार हुए हैं। यही स्थिति रीयल एस्टेट सेक्टर में देखी जा सकती है। भवनों का निर्माण जिस तेजी से हुआ है, मांग उतनी तेजी से नहीं बढ़ी है। बिल्डर्स ने खरीदारों की पूंजी का एक बड़ा भाग भवन निर्माण की जगह और योजनाओं और धंधों में लगा दिया और खरीदारों को धोखा दिया, जिसके कारण सरकार को कड़े कानून बनाना पड़ा। औद्योगिक उत्पादन का विकास दर 1.1 प्रतिशत पर आ गया जो पिछले 81 महीनों का सबसे कम माना जा रहा है। भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में भी गिरावट आई है। 141 देशों में भारत इस वर्ष 10 सीढ़ियां उतर कर 68वें नंबर पर आ गया। विश्वव्यापी मंदी से विदेश व्यापार प्रभावित हुआ है। अमेरिका और चीन में चल रहे ट्रेडवॉर और ब्रेक्जिट की अनिश्चितता से भी विश्व के अधिकांश देश प्रभावित हुए हैं। भारत में भी निर्यात पर आधारित उद्योग-धंधे इस मंदी से जूझ रहे हैं। रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं, आमदनी के स्नोत सूख रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन के अनुसार वर्ष 2018 में विश्व व्यापार का विकास दर तीन प्रतिशत था, जो इस वर्ष 1.2 प्रतिशत पर आ गया है। इतनी बड़ी गिरावट से भारत का विदेश व्यापार प्रभावित नहीं होगा, यह संभव नहीं है।
औद्योगिक उत्पादन में गिरावट के कारण कच्चे माल और एनसिलियरी उद्योगों द्वारा निर्मित पार्ट्स, कलपुर्जो और बड़े उद्योगों में लगने वाले सामान के उत्पादन में कमी हुई है, क्योंकि उद्योगों द्वारा मांग कम हो गई है। उद्योगों का रहतिया बढ़ रहा है, और उनके राजस्व व मुनाफे में कमी हो रही है, जिसका प्रभाव वित्त बाजार पर पड़ रहा है। कंपनियां बैंकों से कर्ज कम ले रही हैं। कर्ज से संबंधित क्रेडिट रेशियो इस वर्ष पिछले वर्ष के 1.65 से 0.25 पर आ गया है। कंपनियों में निवेश भी घट रहा है, विदेशी और देशी निवेशकों के लिए उद्योगों में पूंजी लगाने का आकर्षण भी कम हो रहा है जो अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। शेयर बाजार में अस्थिरता और गिरावट इस बात का संकेत दे रही है।
विकास की गति बढ़ाने के लिए सरकार ने पिछले कुछ माह में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। कॉरपोरेट टैक्स में कमी की गई है। कंपनियां यदि इसका लाभ कीमतों में कमी करके उपभोक्ताओं को दें तो अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा, मांग बढ़ेगी, उत्पादन में बढ़ोतरी होगी एवं रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। मंदी के कारण कंपनियों की स्थिति खराब है, ऐसे में अदेय ऋण के उगाही के लिए कठोर कदम घातक सिद्ध हो सकते हैं। बड़ी संख्या में कंपनियां दिवालिया हो सकती हैं।
सरकार चाहती है कि निवेश बढ़े, कंपनियां उत्पादन और कारोबार के लिए बैंकों से अधिक मात्र में कर्ज लें। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने पांचवीं बार रेपो रेट में कटौती की है। 35 बेसिस प्वॉइंट की कटौती अब तक की सबसे बड़ी है। इसका मकसद है निवेश को बढ़ावा देना और मांग बढ़ाना। कॉमशिर्यल बैंक इसका लाभ कर्ज देने का ब्याज दर घटाकर उद्योगों, पर्सनल और हाउसिंग लोन को सस्ता करके दे सकेंगे। मुद्रा स्फीति नियंत्रण में है, इससे रेपो रेट घटाने का निर्णय अर्थव्यवस्था के हित में होगा। किंतु बैंकों द्वारा जमाकर्ताओं के धन पर ब्याज दर में कमी सावधि और सामान्य बचत को हतोत्साहित करेगी। लोग बैंकों में कम रुपया जमा करना चाहेंगे, निवेश की दूसरी संभावनाओं को तलाशेंगे। एमएसएमई (माइक्रो, स्मॉल एंड मिडियम एंटरप्राइजेज) की समस्याओं के निदान के लिए सरकार ने जो कदम उठाए हैं उनमें प्रमुख है- सार्वजनिक कंपनियों द्वारा इन उद्योगों से खरीद की कम से कम सीमा 20-25 प्रतिशत करना, ई-मार्केट पोर्टल की सुविधा, वित्तीय संस्थाओं से एक करोड़ रुपये तक के कर्ज पर 15 प्रतिशत पूंजी सब्सिडी, 59 मिनट में सिडबी से कर्ज और फार्मा कंपनियों के लिए क्लस्टर की व्यवस्था आदि।
इस वर्ष अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेताओं- अभिजीत बनर्जी, ई-डफलो एवं माइकल क्रेमर ने अपने प्रयोगों के आधार पर गरीबी उन्मूलन के जो सुझाव दिए हैं, उनके मूल में किताबी सोच की जगह व्यावहारिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना है। गरीबों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझना, उनके निर्णय के आधार पर विचार करना और उनके लाभ की सही योजनाएं बनाने का प्रयास होना चाहिए। (पूर्व विभागाध्यक्ष, बिजनेस इकोनॉमिक्स विभाग, दिल्ली विवि)