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(सुदिप्तो मंडल) (अर्थशास्त्री)
(साभार हिंदुस्तान)
नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी, पूर्व रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन और अन्य अनेक अर्थशास्त्रियों ने भारत के विकास की रफ्तार कम होने की गंभीरता को रेखांकित किया है। आर्थिक उद्धार की समेकित रणनीति पर विचार के लिए इससे बेहतर समय नहीं हो सकता। 2017-18 की चौथी तिमाही में विकास दर 8.1 प्रतिशत के शिखर पर थी, लेकिन चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में छह प्रतिशत से भी कम हो गई है। सभी क्षेत्रों में मंदी दिखाई दे रही है। इस संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण सरकारी व्यय में कमी आई है। कमजोर राजस्व वृद्धि के कारण राज्यों को खर्च में कटौती के लिए मजबूर होना पड़ा। सरकार के खर्च में भी कमी आई, यह आर्थिक विकास में गिरावट की एक अहम वजह है। दीर्घावधि में विकास को बनाए रखने के लिए संरचनात्मक सुधारों की शुरुआत करते हुए, अब हमें अल्पावधि में सकल मांग को बहाल करने के लिए एक वृहद आर्थिक रणनीति की आवश्यकता है। गंभीर वैश्विक आर्थिक माहौल को देखते हुए मांग उत्पन्न करने के लिए आंतरिक स्रोतों पर ही हमें ज्यादा निर्भर रहना होगा। सरकार ने आर्थिक उद्धार के लिए जो उपाय किए हैं, वह आपूर्ति पक्ष के लिए हैं, लेकिन समग्र मांग में जो गिरावट हो रही है, उसे पलटना कठिन है।
रिजर्व बैंक ने मांग को पहले की तरह बहाल करने के लिए बार-बार रेपो दर में कटौती की है और ऋण उपलब्धता बढ़ाने के लिए कई उपाय भी किए हैं। हालांकि वास्तविक रूप में बैंक दर अभी भी बढ़ रही है और ऋण प्रवाह अभी भी बाधित है। जहां एक ओर, ऋण की मांग में कमी हुई है, वहीं दूसरी ओर, ऋण लेने-देने के अपने खतरे भी हैं। मौद्रिक नीति का सीमित प्रभाव पड़ रहा है, तो विकास का भार राजकोषीय नीति को ही उठाना पड़ेगा। लगता है, इस वर्ष भी राजस्व में बड़ी कमी होगी और सरकारी व्यय में वृद्धि भी घटेगी। जाहिर है, 2019-20 के बजट अनुमानों को संसद के शीतकालीन सत्र में या उससे पहले ही पर्याप्त रूप से संशोधित करना होगा। आज जरूरी है कि उन गरीब उपभोक्ताओं के हाथों में अधिक पैसे दिए जाएं, जिनमें उपभोग करने की उच्च प्रवृत्ति है। इसका एक मजबूत असर पड़ेगा और यह विकास की रफ्तार बहाल करने के लिए एक समावेशी वित्तीय रणनीति के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए। हालांकि सरकारी खर्चे का वित्तपोषण उधार लेकर नहीं किया जा सकता। वित्तीय घाटे को कम करने की जरूरत है, न कि खर्च वृद्धि को। तो क्या किया जाए? असाधारण हालात में असाधारण उपाय ही करने पड़ते हैं। वित्तीय सुधार ऐसे किया जाए कि राजकोषीय घाटा भी कम हो और गरीबों को मजबूती देने वाले खर्च भी बढ़ें। यह कर दरों को बढ़ाए बिना ही करना होगा।
ध्यान देने की बात है, सरकार अभी जीडीपी का पांच प्रतिशत के करीब कर रियायत दे रही है, लेकिन इसके लाभ स्पष्ट नहीं हैं। जीडीपी का पांच प्रतिशत हिस्सा अयोग्य सब्सिडी पर खर्च किया जाता है। इसके अलावा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने अनुमान लगाया है कि जीडीपी का 1.5 प्रतिशत से अधिक विनियोग राशि के कारण बचता है। जीएसटीएन को युद्धस्तर पर तय करना, कर छूट को कम करना और सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने से जीडीपी का छह से सात प्रतिशत हिस्सा बचाया जा सकता है और खर्च के लिए उपलब्ध हो सकता है। इस राशि का उपयोग विकास तेज करने के लिए किया जा सकता है। सबसे पहले, प्रधानमंत्री किसान योजना में खर्च बढ़ाना जरूरी है। अर्थशास्त्री मैत्रीश घटक और कार्तिक मुरलीधरन की एक रिपोर्ट सलाह देती है कि प्रधानमंत्री किसान योजना का विस्तार कर दिया जाए, हर नागरिक को 6000 रुपये सालाना दिए जाएं। इससे जीडीपी का मात्र एक प्रतिशत खर्च आएगा और यदि यह राशि दोगुनी कर दी जाए, तो जीडीपी का मात्र दो प्रतिशत खर्च आएगा। जैसे-जैसे आर्थिक विकास होता है, वैसे-वैसे इस मदद को भी बढ़ाया जा सकता है। दूसरा, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर अभी भी कम खर्च हो रहा है। इनमें से प्रत्येक को जीडीपी का एक प्रतिशत अतिरिक्त धन मुहैया कराया जा सकता है और इसके बाद जो राशि बचेगी, उससे वित्तीय घाटे को कम किया जा सकता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)