NAUKARIPAO.COM
(डॉ विकास सिंह )
(साभार दैनिक जागरण )
बदलते समय के साथ परिस्थितियां भी बदल चुकी हैं। आज युद्ध बोर्ड रूम में लड़े जाते हैं, ना कि युद्ध के मैदान में। व्यापार के माध्यम से दूसरे देशों पर वर्चस्व हासिल किया जा सकता है। मुक्त व्यापार समझौते के लिए 16 प्रमुख देशों ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी यानी रिजनल कंप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) की पहल की है। यह उन राष्ट्रों के बीच मौजूदा व्यापार में सामंजस्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है जो दुनिया के करीब आधे हिस्से का प्रतिनिधित्व और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का एक तिहाई उत्पादन करते हैं। ऐसे में आरसीईपी को महत्व मिलना स्वाभाविक है, पर इसके लक्ष्य को हासिल करने में बाधाएं भी बनी हुई हैं। यह सच है कि आरसीईपी की सफलता से साढ़े तीन अरब लोगों का बाजार खुलेगा। यह आसान भी नहीं होने वाला है। राजकोषीय व सांस्कृतिक अंतर को पाटना मुश्किल है। प्रति व्यक्ति जीडीपी के साथ ऑस्ट्रेलिया सबसे अमीर देश है जो सबसे गरीब देश से 50 गुना अधिक है।
यह आश्चर्य की बात नहीं है कि आरसीईपी पर प्रगति समग्र रूप से कई वर्षो की वार्ताओं के बाद हुई है, लेकिन इसमें अभी भी समर्पण का अभाव है। बढ़ते संरक्षणवाद और अमेरिका तथा चीन के बीच व्यापार युद्ध को देखते हुए इस समझौते को अंतिम रूप देना जरूरत के साथ ही वक्त की मांग भी थी, लेकिन इसमें पूर्व के वैश्विक व्यापार की पेचीदगियों के समाधान और भविष्य की दृष्टि का अभाव है। हालांकि उम्मीद बनी हुई है, क्योंकि संबंधित पक्ष इन मुद्दों को सुलझाने का इरादा रखते हैं। स्थानीय उद्योगों के पहलुओं की रक्षा के लिए अस्थायी निगरानी तंत्र को शामिल करना जरूरी है।
आरसीईपी भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती दरार के बीच दुनिया को द्वि-ध्रुवीय बनने से रोकना एक चुनौती है और ऐसे में भारत अपने स्वयं के क्षेत्र को तराशने की कोशिश में जुटा है। यह आंशिक रूप से चीन के व्यापारिक आक्रमण को देखने की अपनी घरेलू मजबूरी से प्रेरित है जो उसके घरेलू उद्योग को नुकसान पहुंचा रहा है। और साथ ही एक अवसर है जो अमेरिका-चीन के शुल्क युद्ध से उत्पन्न हुआ है। एक महत्वाकांक्षी नेतृत्व, एक बढ़ती अर्थव्यवस्था और जनसांख्यिकीय लाभांश के कारण भारत अपनी ताकत व इच्छाशक्ति के बल पर इसका लाभ उठा सकता है। इसलिए अब यह दूर की कौड़ी नहीं है। लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि कल से पहले, आज आता है।
उच्च संभावित विनिर्माण क्षेत्र वह है जो हमारी आशा को उच्च स्तर पर पहुंचाता है। वैश्विक विनिर्माण में हमारा हिस्सा दो प्रतिशत है। एक अध्ययन बताता है कि प्रत्येक एक प्रतिशत वृद्धिशील हिस्सेदारी से 50 लाख नौकरियां पैदा होंगी और इससे अर्थव्यवस्था को कई गुना फायदा होगा।
भारत एक बड़ा उपभोक्ता बाजार है, फिर भी व्यापार महाशक्ति नहीं है। हमें आत्मचिंतन करने की जरूरत है। व्यापार परिदृश्य को नया आकार देने के लिए अंतर्दृष्टि, डिजाइन और वितरित करने की हमारी क्षमता काफी महत्वपूर्ण है। प्रचलित श्रम कानून, जटिल कर संरचना और नौकरशाही की जड़ता, प्रतिस्पर्धा को केवल कम करती है। इसके अलावा, मुद्रा अवमूल्यन और डंपिंग के बारे में हमारी प्रतिक्रिया अधिकांशत: अपर्याप्त और रक्षात्मक होती है।
व्यापार समझौते अनुकूल होने चाहिए, लेकिन अधिकांश समझौते ऐसे होते नहीं हैं और कुछ समझौतों में तो विजेता सब कुछ हासिल कर लेते हैं। चीन पर अक्सर छोटे देशों को धमकाने के आरोप लगते रहे हैं। चीन के बड़े आकार की वजह से भारत को इस प्रतिस्पर्धा में चीन से मुकाबला करना है।
हमें आरसीईपी को साकार करने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। चीनी बाजार तक पहुंच के लिए चीन के साथ बातचीत व्यापार में सबसे कमजोर कड़ी रही है, जिसका मुख्य कारण बीजिंग की ‘संरक्षणवादी नीतियां’ हैं जो दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण व्यापार घाटा को पैदा करता है। हमारे 105 अरब डॉलर के आरसीईपी व्यापार घाटे का आधा हिस्सा चीन के पास है और किसी भी बढ़ोतरी से आयात में वृद्धि हो सकती है, जो घरेलू उद्योग को नुकसान पहुंचा सकता है। चीन द्वारा शुल्क में कोई कटौती करने से हमारी मोल-भाव की क्षमता कम होती है और हमें इसका कोई फायदा भी नहीं मिलता है, क्योंकि हमने आरसीईपी के सदस्यों के साथ गैर-शुल्क बाधाओं पर बातचीत नहीं की है। इसी प्रकार, आरसीईपी सदस्य देशों से आयात में वृद्धि के खिलाफ एक ऑटो-टिगर तंत्र का प्रस्ताव प्रभावी होने की संभावना नहीं है।
बोङिाल पंजीकरण प्रक्रिया और लाइसेंस देने में अनावश्यक देरी से भारतीय दवा और हमारे कई उद्योग बड़े चीनी बाजार से बाहर हैं। स्वाभाविक रूप से डेयरी, धातु, इलेक्ट्रॉनिक्स और रसायन सहित कुछ क्षेत्रों ने सामूहिक रूप में चीन की उपस्थिति पर चिंता जताई है और सरकार को इन क्षेत्रों में शुल्क कटौती पर सहमत नहीं होने के लिए प्रभावित किया है। अन्य प्रमुख चिंताओं में इलेक्ट्रॉनिक आंकड़ा साझाकरण और स्थानीय आंकड़ा भंडारण की आवश्यकता की मांग शामिल है, जिसके प्रभावी होने से आंकड़ों का सीमा पार प्रवाह नियंत्रित होगा। इसी तरह, डेयरी आयात का विरोध, जेनेरिक दवा तक पहुंच सुनिश्चित करना, खनन मुनाफा का देश में बने रहना और पानी, दूरसंचार, ऊर्जा और परिवहन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में निजीकरण का विरोध महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही समाज में आर्थिक असमानता को देखते हुए एक प्रमुख चिंता यह है कि इससे बहुत से लोग पिछड़ जाएंगे।
अब तक, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आरसीईपी देश कई चुनौतियों के बावजूद अभी भी अपने मतभेदों को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। चीन-भारत संबंधों को बनाए रखना और विकसित करना वार्ता का एकमात्र लक्ष्य है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में, चीन और भारत वैश्विक स्थिरता की सुरक्षा और विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को निभा सकते हैं।
भारतीय राजनेताओं को यह समझना होगा कि आरसीईपी वार्ता अभिनव, समग्र, उच्च गुणवत्ता और पारस्परिक रूप से एक लाभप्रद आर्थिक भागीदारी है। व्यापार हमेशा से संबंधित क्षेत्र में सद्भाव और शांति लाने का एक तरीका रहा है और इसे दो प्राचीन संस्कृतियों से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता है, जो कभी व्यापार और वाणिज्य में अग्रणी थे।