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अमेजन की आग से बढ़ता वैश्विक संकट

(नरपतदान चारण)

(साभार दैनिक जागरण )

    जंगलों में आग एक बड़ी समस्या बन रही है। पिछले करीब एक-डेढ़ माह से दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील में अमेजन के जंगलों में भीषण आग लगी हुई है। अब तक करीब 50 हजार वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र जलकर खाक हो चुका है। आग की भयावहता इतनी अधिक है कि 45 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में धुंआ पसरा हुआ है। ब्राजील की राजधानी साओ पाउलो में धुएं के कारण अंधकार छाया हुआ है। वहीं ब्राजील के राष्ट्रीय अंतरिक्ष शोध संस्थान के अनुसार इस वर्ष अभी तक जंगलों में आग के 74 हजार से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। यह अपनेआप में बड़ी लापरवाही की ओर इशारा कर रहा है। यह पर्यावरण के लिए बड़ी भयानक स्थिति है।

    ब्राजील सरकार आग बुझाने के प्रयास कर रही है, लेकिन आग पर काबू नहीं पाया जा सका है। मालूम हो कि यह क्षेत्र दुनिया का सबसे बड़ा वर्षा वन है। दुनिया के एक तिहाई वन इस अमेजन क्षेत्र में फैले हैं। यह दक्षिण अमेरिका से लेकर ब्राजील तक करीब 21 लाख वर्ग मील तक फैले हुए हैं। इन अमेजन वर्षा वनों को ‘धरती के फेफड़े’ कहा जाता है। इन वनों में करीब 30 हजार प्रजाति के वृक्ष हैं। साथ ही इस पूरे क्षेत्र में पक्षियों, स्तनधारियों, कीटों, सांपों आदि की लाखों प्रजातियां हैं। इन्हीं वनों से पूरी दुनिया को लगभग 20 फीसद ऑक्सीजन प्राप्त होती है और हर वर्ष करीब 140 अरब टन कार्बन सोखते हैं। यह एक तरह से ग्लोबल वार्मिग और कार्बन से बचाव के लिए ‘डॉक्टर’ का काम करते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह वन क्षेत्र खत्म होता है तो इसका पूरी दुनिया पर प्रभाव पड़ेगा। इसीलिए इस आग पर यहां कई प्रश्न खड़े होते हैं। क्या यह आग स्वाभाविक रूप से पैदा हुई है या फिर इस आग के पीछे कोई साजिश है? आग पर नियंत्रण के लिए विश्व समुदाय उदासीन क्यों है? संयुक्त राष्ट्र खामोश क्यों है? पर्यावरणीय संस्थाएं आवाज क्यों नहीं उठा पा रही हैं?

    हालांकि इन सभी सवालों के उत्तर तो समय ही बताएगा। वैसे फ्रांस के बायरिट्ज में हालिया आयोजित जी 7 शिखर सम्मेलन में इस मसले पर चिंता जरूर जताई गई, और ब्रिटेन की ओर से आग बुझाने के लिए मदद के तौर पर फंड देने की पेशकश भी की गई, परंतु ब्राजील ने उसे ठुकरा दिया, जिससे इस समस्या से निपटने का इस सम्मेलन में कोई ठोस उपाय नहीं निकाला जा सका।

    ब्राजील के राष्ट्रपति जेर बोलनोसारो का तो यह भी आरोप है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रहे एनजीओ इस आग के साजिशकर्ता हंै। कहा जा रहा है कि एनजीओ को रकम नहीं मिल रही है, इसलिए ब्राजील के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। वहीं पर्यावरणविदों का कहना है कि राष्ट्रपति की नीतियां इस आग के लिए जिम्मेदार है। पर्यावरण के जानकारों का मत है कि इसकी दोषी ब्राजील सरकार की नीतियां रही हैं। सरकार ने वर्षा वनों से जुड़े पर्यावरणीय नियमों में शिथिलता प्रदान की, नतीजन ओद्यौगिक घरानों और स्थानीय नागरिकों ने वर्षा वनों के दोहन का काम प्रारंभ कर दिया। खेती के लिए भूमि तैयार करने के लिए भी जंगलों को जलाया जा रहा है। हो सकता है कारण कोई और भी हो। लेकिन अभी यहां मूल सवाल आग पर काबू पाने का है। आग बुझाने के साझा वैश्विक प्रयासों की आवश्यकता है।

    आग से बचने के लिए कोई प्रभावी तरीके ना होना भी बड़ी समस्या है। आज भी जंगलों की आग को रोकने के संबंध में फायर एक्सपर्ट आकलन करते हैं, जैसे हवा की रफ्तार, ढलान और आग की दिशा, वह ईंधन जिसकी वजह से आग लगने की संभावना है आदि। आग से बचने के लिए पहले से संभावित स्थान को पानी से गीला करके या उन चीजों को हटाकर जिनसे आग लग सकती है, जैसे तरीकों से इस समस्या से बचा जा सकता है। अमेजन की भीषण आग से कोई हैरान नहीं लग रहा। ना तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया और ना ही संयुक्त राष्ट्र और अन्य देश इसे इतनी गंभीरता से ले रहे हैं। दुनिया की कुछ बड़ी सेलिब्रिटी ने इस बारे में लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए ट्वीट जरूर किए हंै। कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने और ग्लोबल वार्मिग के स्तर को नीचा लाने के प्रयासों पर भी यह सवालिया निशान है।

    यह सच है कि वन संसाधन मानव सभ्यता और पर्यावरण के लिए आवश्यक तत्व है। वन संसाधन ही धरती के अस्तित्व के लिए पारिस्थितिक तंत्र में संतुलन और मानव की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। लेकिन पर्यावरण बचाने की दुहाई देने वाला संयुक्त राष्ट्र और समूचा विश्व यह क्यों भूल जाता है कि जंगलों की आग किसी एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक पर्यावरणीय स्थिति के लिए घोर संकट का मामला है। धरती के अस्तित्व को बचाने के लिए वृक्षों और अन्य पर्यावरणीय घटकों को बचाना बेहद आवश्यक है। इस आग पर काबू पाने के लिए पूरे विश्व को अपनी आर्थिक और तकनीकी मदद देनी चाहिए। वैश्विक समुदाय के साझा प्रयासों के बिना जंगलों की आग रोकना आसान नहीं होगा। हमें यह समझना होगा कि किसी एक देश के जंगलों में आग लगने पर शेष विश्व का मूक दर्शक बने रहना हमारे अस्तित्व पर ही संकट पैदा करने वाला कदम साबित होगा। वनों के संरक्षण का जिम्मा केवल वनों की भूमि वाले देश के जिम्मे नहीं होना चाहिए। जंगलों को बचाने के लिए एक वैश्विक वन संरक्षण फोर्स का गठन किया जाना चाहिए। आम नागरिकों को इसका भागीदार बनना पड़ेगा। अन्यथा ग्लोबल वार्मिग और कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ते प्रभाव के लिए भविष्य में हम किसी को दोषी ठहराने के लायक नहीं रहेंगे।

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