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(विवेक ओझा )
(साभार दैनिक जागरण )
जर्मनी में आज बर्लिन की दीवार के टूटने की 30वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में कई समारोह आयोजित किए जा रहे हैं। पूर्वी बर्लिन को पश्चिमी बर्लिन से पृथक करने के लिए वर्ष 1961 में बर्लिन की दीवार बनाई गई थी। 150 किलोमीटर लंबी यह दीवार 28 वर्षो तक अस्तित्व में रही और नौ नवंबर 1989 को जन आक्रोश का शिकार बनी।
बर्लिन की दीवार पूंजीवादी और साम्यवादी विश्व के बीच विभाजन का प्रतीक था। अमेरिका और सोवियत संघ (वर्तमान रूस जिस संघ का प्रमुख हिस्सा है) के बीच विचारधारा के स्तर पर लड़े गए शीत युद्ध का भी यह प्रतीक था। यहां यह जानना जरूरी है कि शीत युद्ध में दो महाशक्तियों अमेरिका और सोवियत संघ के बीच जर्मनी या बर्लिन कैसे मोहरा बना। वर्ष 1917 में सोवियत संघ में हुई बोल्शेविक क्रांति ने वहां जार (रूसी सम्राट) के शासन का अंत कर साम्यवादी शासन की स्थापना की। अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों ने इसे उदारवादी पूंजीवादी विचारधारा के लिए बड़ा खतरा माना। अमेरिका ने सोवियत संघ को वर्ष 1933 तक कूटनीतिक मान्यता भी नहीं दी थी। कालांतर में दोनों देश अपने साङो शत्रु नाजी जर्मनी के खिलाफ साथ आने के लिए बाध्य हुए। हिटलर द्वारा पोलैंड पर आक्रमण करने के पहले सोवियत संघ और नाजी जर्मनी में एक समझौता भी हुआ था जिसके तहत जर्मनी सोवियत संघ पर हमला नहीं करता, लेकिन जून 1941 में जर्मनी ने सोवियत संघ पर अचानक हमला कर दिया। यही वह कारण था जिससे सोवियत संघ द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका और पश्चिमी देशों वाले मित्र राष्ट्रों के गुट से जुड़ गया था। लेकिन इस सच को नहीं झुठलाया जा सकता था कि दोनों की विचारधाराएं भिन्न थीं, और एक दूसरे पर अविश्वास करने के मौके दे रही थीं। नाजी जर्मनी का हिटलर के नेतृत्व में बढ़ते अधिनायकवाद को महाशक्तियों ने बड़ा खतरा समझा। इसलिए जब यह तय हुआ कि जर्मनी के खिलाफ द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्र लड़ेंगे, तो उन्होंने साथ ही यह भी तय करने के बारे में सोचा कि पराजित जर्मनी के साथ क्या किया जाएगा।
फरवरी 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में याल्टा सम्मेलन दूसरी प्रमुख बैठक थी जिसमें ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल, सोवियत प्रधानमंत्री जोसेफ स्टालिन और अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने भाग लिया था। तीनों नेता जर्मनी के शर्तरहित आत्मसमर्पण की मांग करने पर सहमत हुए और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की विश्व व्यवस्था के लिए योजनाएं बनाने का काम शुरू कर दिया। इन नेताओं में सहमति बनी कि विजित देश जर्मनी को चार आधिपत्य क्षेत्रों में बांटा जाएगा, जो अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ और फ्रांस के द्वारा प्रशासित किया जाएगा।
इस बीच वैश्विक राजनीति में अनेक बदलावों के साथ शीत युद्ध तनाव जर्मनी के मुद्दे पर शुरू हो गया। इसके साथ ही जून 1948 में पश्चिमी जर्मनी का निर्माण हुआ और उसके लिए एक पृथक मुद्रा डॉयचे मार्क की फ्रेंच, अमेरिकी और ब्रिटिश जोन (जर्मनी को चार आधिपत्य जोन में पहले ही बांटा गया था) भी शुरुआत की गई और इसके विरोध में उसी वर्ष सोवियत संघ ने बर्लिन की नाकेबंदी (पूर्वी जर्मनी में) कर दी, जिसका उद्देश्य बर्लिन में पश्चिमी मुद्रा और वस्तुओं के आयात को रोकना था। बदले में पश्चिमी शक्तियों ने बर्लिन एयरलिफ्ट योजना को आरंभ किया। सोवियत संघ इस पर अड़ा रहा कि पश्चिमी देश बर्लिन को खाली कर दें, जबकि अमेरिका ने कहा कि जब तक जर्मनी को एक नहीं कर दिया जाता, तब तक ऐसा नहीं होगा।
पूर्वी बर्लिन को पश्चिमी बर्लिन से पृथक करने के लिए वर्ष 1961 में बर्लिन की दीवार बनाई गई थी। ये दीवार इसलिए बनाई गई, क्योंकि पश्चिमी बर्लिन और पश्चिमी जर्मनी अमेरिका के नेतृत्व वाले पूंजीवादी पश्चिमी देशों के प्रभाव और नियंत्रण में था, जबकि पूर्वी बर्लिन और पूर्वी जर्मनी सोवियत संघ के साम्यवादी गुट के प्रभाव और नियंत्रण में। पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच विचारधारा की लड़ाई वह प्रमुख कारण था जिसने जर्मनी की जनता और उसके भौगोलिक क्षेत्रों को बुरी तरह से बांट रखा था।
वर्ष 1961 में पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन के बीच मानसिक दीवार के रूप में 150 किलोमीटर लंबी बर्लिन दीवार अगले 28 वर्षो तक अस्तित्व में रही और अंतत: नौ नवंबर 1989 को जन आक्रोश का शिकार बनी और इसे गिरा दिया गया। इसने जर्मनी के एकीकरण और शीत युद्ध कालीन साम्यवादी गुट के समापन की नींव रख दी। पोलैंड में सोलिडैरिटी मूवमेंट, लिथुआनिया, लाटविया, एस्टोनिया की जनता द्वारा सोवियत संघ से बाहर निकलने के लिए विद्रोह व 1989 में ईस्ट जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख द्वारा यह घोषणा कि पूर्वी जर्मनी के लोग सीमा पार कर जहां मन हो जा सकते हैं, आदि कारकों ने शीत युद्ध के अंत का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
बर्लिन के दीवार के गिराए जाने की घटना का महत्व आज की वैश्विक राजनीति और राष्ट्रों की घरेलू समस्याओं के समाधान की दृष्टि से बना हुआ है। उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया की सरकारों और जनता के बीच के विवाद को देखें, तो स्पेन में कैटालोनिया की जनता के मन द्वेष की भावना और अलग राष्ट्र बनाने की कवायद देखें, कश्मीर और भारत संघ के मध्य दशकों से बने मेंटल बॉर्डर को देखें, इन सभी के समाधान में बर्लिन की दीवार जैसा साहस और जन संप्रभुता की ताकत का मूर्त स्वरूप लेना जरूरी समझा गया है।
इजरायल और फिलिस्तीन, भारत और पाकिस्तान, ईरान और सऊदी अरब, अमेरिका और मैक्सिको तथा कोलंबिया की सरकारों और जनता के बीच की मानसिक दूरी को भरने का संदेश भी बर्लिन की घटना में तलाशा जा सकता है। एकीकृत जर्मनी आज खुशहाल है और यूरोपीय संघ के प्रमुख सदस्य के रूप में आर्थिक विकास की दिशा में अग्रसर है। दुनिया भर के देशों की सरकारों और जनता में जब विकास, प्रगति, समृद्धि, शांति और स्थिरता जैसे मूल्यों को तरजीह देने की मानसिकता विकसित होने लगेगी, तब दुनिया भर में कई और बर्लिन की दीवारें टूटेंगी।