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बारिश और मौसम के बदलते रिश्तों में मानसून

(अभिषेक कुमार सिंह. वरिष्ठ लेखक )
(साभार हिंदुस्तान )

    जब फरवरी और मार्च के महीने में भी बारिश हर कुछ दिन बाद बरस रही है और वेस्टर्न डिस्टरबेंस खबरों में लगातार छाया हुआ है, मानसून को लेकर एक बार फिर राहत देती भविष्यवाणियां सामने आ गई हैं। निजी एजेंसी स्काईमेट की तरफ से दावा किया जा रहा है कि इस साल जून से सितंबर के बीच चार महीने की अवधि में सामान्य मानसूनी वर्षा होगी। इसके मुताबिक इससे खेती में लाभ होगा और भारतीय अर्थव्यवस्था भी बढ़ेगी। अत्यधिक बारिश के आसार काफी कम हैं। हालांकि इस दौरान सूखे की आशंका नहीं रहेगी पर दक्षिणी और पूवार्ेत्तर हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रह सकती है। अक्सर इस बात पर राहत जताई जाती है कि अगर मानसून ठीकठाक बीत रहा है तो देश की आर्थिक विकास दर (जीडीपी) पर कोई नकारात्मक असर पड़ने की आशंका भी नहीं रहती है। मानसून में बादल खूब बरसेंगे तो फसल अच्छी होगी, ग्रोथ रेट तेज भागेगी। बहुत सी कंपनियां इसी भविष्यवाणी के आधार पर अपने मुनाफे का अनुमान लगाती हैं। सूखे की आंशका न रहने के कारण सरकारें तो राहत की सांस लेती ही हैं। विडंबना यह है कि इतना पहले की गई भविष्यवाणी बहुत भरोसेमंद नहीं होती। तमाम उपग्रहों और सुपर कंप्यूटरों के संजाल के बावजूद मौसम और मानसून के अंदाज को सौ फीसदी सही समझ पाना बेहद मुश्किल है। चाहे जितनी सटीक भविष्यवाणी का दावा किया जाये, पर सच यह है कि मानसून के दौरान बारिश और उसके पैटर्न में थोड़ी-बहुत ऊंच-नीच या कमी-बेशी का खतरा हमेशा मौजूद रहता है। इसलिए नीतियां बनाते समय या भविष्यवाणी के आधार पर राहतों का आकलन तय करते समय इस उतार-चढ़ाव के लिए स्पेस रखना जरूरी है। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों की वजह से पूरी दुनिया का मौसमी-चक्र तेजी से बदल रहा है। अगर इन बातों को हाशिये पर रखा जाएगा और इनके आधार पर तैयारियां नहीं की जाएंगी, तो मानसून पर हमारी डगमगाती निर्भरता कम होने की बजाय और बढ़ सकती है। इसके कई और पहलू हैं, जो साबित करते हैं कि मानसून जैसी बारिशों से रिश्ता अब टूट की कगार पर है। जैसे, कई देशों ने ऐसी फसलों पर ध्यान देना भी शुरू कर दिया है, जिनके लिए पानी की ज्यादा जरूरत नहीं होती। उधर, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों में अतिक्रमण के चलते बारिश अपना रास्ता बदल रही है। भारत में ही अब तक जो उत्तर-पूर्वी इलाका धुआंधार बारिश के लिए जाना जाता था, दावा है कि आगे चलकर ये इलाके सूखा झेलेंगे और अपने सूखेपन के लिए मशहूर देश के मध्य-पश्चिमी हिस्से जबर्दस्त नमी के लिए जाने जाएंगे। आईआईटी मुंबई बारिश के 112 साल के आंकड़ों का हिसाब लगाकर पिछले वर्ष 2018 में बता चुकी है कि देश के कुल 632 में से 238 जिलों में बरसात का पैटर्न बदल चुका है। बदले हुए पैटर्न को राजस्थान और गुजरात में भी देखा जा सकता है, जहां 1901 से 2013 के बीच राजस्थान में नौ प्रतिशत तो गुजरात में 26.2 प्रतिशत ज्यादा बारिश दर्ज की गई है। पिछले कुछ वषार्ें में इन दोनों प्रदेशों में सौ से ज्यादा लोगों ने अपनी जान बारिश के कारण गंवाई है। अमेरिका स्थित मेसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने अपने एक शोध में बताया कि बीते 15 सालों में भारत के उत्तरी और मध्य इलाकों में अच्छा पानी बरसा है, लेकिन इसका जोर उन इलाकों में ज्यादा है, जो हाल तक सूखे रहते थे। साफ है कि मानसून के इस नए ट्रेंड को ध्यान से समझने और प्रभावित इलाकों के लिए ठोस रणनीति बनाने की जरूरत है क्योंकि इसी दौरान उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, असम, जम्मू और कश्मीर, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड जैसे ज्यादा बारिश वाले राज्यों में हर दूसरे-तीसरे साल सूखे की नौबत आ रही है और किसान अपनी सूखी फसलों का मुआवजा मांगने लगे हैं। पर क्या वास्तव में एक खेती प्रधान अर्थव्यवस्था इस दौर में पहुंच गई है कि हम मानसून से अपना रिश्ता खत्म घोषित कर दें? हम इस नतीजे पर एकदम भले न पहुंचना चाहें, पर यह सच है कि मानसून में अब पहले की तरह आशंकित करने वाले तत्व नहीं रहे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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