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एयर स्ट्राइक में इसरो की भूमिका

(साभार दैनिक जागरण )


    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने देश-दुनिया के सैकड़ों उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण करके साबित किया है कि तेजी से बढ़ते अंतरिक्ष बाजार में अब उसका कोई मुकाबला नहीं है, पर जब बात दुश्मन देशों से अपनी रक्षा करने और आतंकवाद से लोहा लेने की हो तो उसमें भी इसरो के उपग्रहों की एक शानदार भूमिका हो सकती है-यह बात हाल में (26 फरवरी, 2019 को) पाकिस्तान स्थित बालाकोट में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर पर भारतीय हवाई हमले से साबित हुई है। इसे लेकर भले ही पाकिस्तान और अपने देश में विपक्षी दल यह विवाद खड़े कर रहे हों कि इस हमले में भारत सरकार मारे गए आतंकियों की सही संख्या नहीं बता पा रही है, पर जिन्हें वायुसेना और खास तौर से इसरो की काबिलियत पर भरोसा है, वे जानते हैं कि मिराज-2000 विमानों से रात के अंधेरे में किए गए इन हवाई हमलों की सटीकता कितनी अधिक रही होगी। जब कभी दो पड़ोसी देशों के बीच सैन्य ताकत की तुलना होती है तो अक्सर यह सैनिकों की तादाद के अलावा लड़ाकू विमानों, जंगी जहाजों, टैंकों और मिसाइलों और मारक क्षमता तक सीमित रह जाती है। इसमें विज्ञान के उन दूसरे क्षेत्रों की तरक्की को नहीं जोड़ा जाता है, जिनकी मदद से किसी भी आकलन और हमले की स्थिति में देश को बढ़त हासिल होती है। वस्तुत: भारत की सैन्य तैयारियों के संबंध में आज यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि लड़ाकू विमान, टैंक-तोपें और जंगी जहाज ही नहीं, बल्कि आसमान में तैनात इसके दर्जनों उपग्रह इसे ऐसी ताकत दे रहे हैं जिसका कोई मुकाबला पाकिस्तान हरगिज नहीं कर सकता है। आसमान में हर वक्त चौकसी कर रहे इसरो के उपग्रह पड़ोसी मुल्क के चप्पे-चप्पे की खबर रख रहे हैं। यही नहीं, अब तो यह दावा भी किया जा रहा है कि भारत अपने उपग्रहों के जरिए पाकिस्तान के 87 फीसद क्षेत्र यानी कुल 8.8 लाख वर्ग किलोमीटर में से 7.7 लाख वर्ग किलोमीटर इलाके पर पैनी नजर रखने में सक्षम हो गया है। इससे भारत जब चाहे, पाकिस्तान के सामरिक इलाकों की गतिविधियों को देख सकता है और अपने उपग्रहों के जरिये महत्वपूर्ण नक्शे और तस्वीरें हासिल कर सकता है। पांच करोड़ वर्ग किमी पर नजरवैसे तो अन्य स्पेस एजेंसी की तरह ही इसरो को दूरसंचार और मौसम की जानकारी लेने वाले उपग्रहों की तैनाती के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। दूरसंचार यानी टेलीविजन और टेलीफोन आदि जरूरतों के लिए इसरो ने कई उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किए हैं। इनके बाद प्राकृतिक आपदाओं की सूचना आदि की जानकारी संबंधी आवश्यकताओं के मद्देनजर इसरो ने उपग्रहों का एक नेटवर्क तैनात किया है जो बदलते मौसम की सूचनाएं मुहैया कराते हैं और इनकी मदद से भारतीय मौसम विभाग तमाम जानकारियां संबंधित क्षेत्रों को जारी करता है। इसी तरह विदेशी नेविगेशन सिस्टम को मुकाबला देने के लिए इसरो स्वदेशी जीपीएस के लिए भी अपने उपग्रहों का नेटवर्क तैयार कर रहा है, पर इन चीजों के अलावा आज महत्व सैन्य और जासूसी के मकसद से उपग्रहों की सेवाएं लेने का भी है। इस नजरिये से देखें तो पिछले पांच-छह वर्षो में इसरो ने कई ऐसे सैटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित किए हैं, जिनकी मदद से भारत की क्षमता आस-पड़ोस के 14 देशों के करीब साढ़े 5 करोड़ वर्ग किलोमीटर दायरे वाले भूभाग पर सूक्ष्म नजर रखने की हो चुकी है। दिख रहा है दस का दम असल में बीते करीब आधे दशक में इसरो ने एक के बाद एक कई ऐसे उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किए हैं जो अपने ताकतवर उपकरणों की सहायता से जमीन का कोना-कोना खंगालते रहते हैं। खुद सेना यह स्वीकार करती है कि देश की सरहदों से लेकर पड़ोसी मुल्कों की जमीन पर हो रही गतिविधियों पर करीबी नजर रखने संबंधी जरूरतों का 70 फीसद हिस्सा इसरो के सैटेलाइट पूरा कर देते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस वक्त इसरो के कम से कम 10 उपग्रह ऐसे हैं जो देश की सैन्य और खुफिया जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। इनमें खास तौर से काटरेसैट सीरीज, जीसैट-7, जीसैट-7 ए, आइआरएनएसएस यानी इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम, माइक्रोसैट, आरआइसैट और हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग यानी हाइसिस सैटेलाइट का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि उड़ी हमले के उपरांत सितंबर 2016 में जब भारत की ओर से नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था तो उसमें एक अहम रोल काटरेसैट सीरीज के उपग्रहों ने निभाया था। इन उपग्रहों से बेहद बारीक डिटेल्स के साथ फोटो उपलब्ध कराए गए थे, जिनके विश्लेषण के बाद सेना को जमीनी हालात का आकलन करने और हमले की सर्वाधिक उपयुक्त जगह एवं समय का चुनाव करने में मदद मिली थी। काटरेसैट से माइक्रोसैट तक वैसे तो काटरेसैट सीरीज की शुरुआत वर्ष 2005 में ही हो गई थी, लेकिन सैन्य महत्व के उपग्रहों के सिलसिले की बात करें तो इसका आरंभ वर्ष 2007 में काटरेसैट-2ए के प्रक्षेपण से हुआ था। यह दोहरे उपयोग वाला उपग्रह था जो मौसम की जानकारियां बटोरने के साथ भारत के अड़ोस-पड़ोस में मिसाइलों के हर मूवमेंट पर नजर रख सकता था। इसके बाद जून 2012 में छोड़े गए काटरेसैट-2सी से पड़ोसी देशों के संवेदनशील ठिकानों के वीडियो रिकॉर्ड करने और उसका विश्लेषण कर उन्हें वापस धरती पर भेजने की सुविधा देश को मिल गई। इसी सीरीज में अगला उपग्रह काटरेसैट-2ई था जो जून 2017 में छोड़ा गया। इनके अलावा कई अन्य सैटेलाइट और हैं जिनसे दूसरे किस्म की बेहद जरूरी और संवेदनशील सूचनाएं देश और सेना को मिलती हैं। जैसे एक जुलाई 2013 और 12 अप्रैल, 2018 को अंतरिक्ष में भेजे गए आइआरएनएसएस सीरीज के उपग्रहों से देश की सरहद के 1600 किलोमीटर इलाके की बारीक निगरानी की जाती है और विशेष मिसाइलों की तैनाती और उनके मूवमेंट की थाह इनके जरिये ली जाती है। इसी तरह 30 अगस्त, 2013 को प्रक्षेपित जीसैट-7 से भारतीय नौसेना को अपनी संचार संबंधी जरूरतें और समुद्री सीमा की निगरानी करने में बहुत मदद मिलती है। इसके बाद 19 दिसंबर, 2018 को अंतरिक्ष में भेजे गए जीसैट-7ए से भारतीय वायुसेना को अपनी संचार संबंधी जरूरतें पूरा करने में बहुत मदद मिली। यह एक बेहद उच्च क्षमता वाला सैन्योपयोगी उपग्रह है जो मिसाइलों और विमानों की हलचलों पर बारीक नजर रखने के साथ-साथ उड़ रहे विमानों के बीच हो रहे संवाद-संचार को पकड़ सकता है और फौरन उसकी जानकारी जमीन पर मौजूद सेंटर को दे सकता है। यह ड्रोन को कंट्रोल करते हुए उन्हें दुश्मन के इलाके में हमले के लिए भेज सकता है और दुश्मन के ड्रोन पर नजर भी रख सकता है। हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट यानी हाइसिस को 28 नवंबर, 2018 को छोड़ा गया था और इससे रात के अंधेरे में भी तस्वीरें खींचकर जमीन के कुछ सेंटीमीटर जितने हिस्से की सूक्ष्म निगरानी की जा सकती है। यहां तक कि जमीन में दबाई गई बारूदी सुरंगों और आइईडी का भी हाइसिस से पता लगाया जा सकता है। इनके अलावा इसी साल 23 जनवरी, 2019 को प्रक्षेपित उपग्रह माइक्रोसैट-आर को इस मायने में खास कहा जा सकता है कि इसका निर्माण विशुद्ध रूप से सैन्य उद्देश्यों के लिए डीआरडीओ ने किया है। यह एक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है यानी इससे जमीनी हलचलों की बेहद सूक्ष्म जानकारी ली जा सकती है। यह उपग्रह सेना को हालात के मुताबिक योजना बनाने और दुश्मन की गतिविधि की निगरानी करने में मदद देता है। आसमान में तैनात इसरो के इन उपग्रहों के संजाल को देखते हुए यदि यह कहा जाए कि इस वक्त देश दुश्मन मुल्क के हर संदिग्ध ठिकाने तक में झांकने की हैसियत रखता है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस क्षमता के आधार पर यह दावा भी उचित ही लगता है कि 28 फरवरी, 2019 को पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकी प्रशिक्षण शिविर पर हमारी वायुसेना ने जो हमला किया, वह न केवल बेहद सटीक था, बल्कि इतना संहारक था कि उससे दुश्मन देश के होश ठिकाने आ गए। हाल में पेंटागन की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि चीन और रूस लेजर हथियारों समेत ऐसी अंतरिक्ष क्षमता विकसित कर रहे हैं, जो अमेरिकी उपग्रहों को लक्षित और उसे क्षतिग्रस्त कर सकते हैं। ‘चैलेंज टू सिक्योरिटी इन स्पेस’ शीर्षक वाली रपट में रूस, चीन, ईरान और उत्तर कोरिया की अंतरिक्ष क्षमताओं की जांच की गई थी। कहा जा रहा है कि जमीनी लड़ाई में तो परमाणु संपन्न देशों पर हावी हो पाना मुश्किल है, इसलिए दुनिया के ताकतवर देश अब स्पेस वॉर की तैयारियों में लगे हुए हैं। स्पेस वॉर का जो मोटा-मोटा खाका अभी तक सामने आया है, उसमें मुख्य रूप से तीन तरह की प्रणालियों की बात की जा रही है। पहली तो यह है कि अगर कोई शत्रु देश अमेरिका पर आक्रमण करता है तो अंतरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा में स्थित सैन्य उपग्रह-कॉमन एयरो व्हीकल से तीन हजार नॉटिकल मील की गति से एक हजार पाउंड तक के वजन वाला बम बिल्कुल सटीक निशाने पर दागा जा सकेगा। इसी तरह अंतरिक्ष में तैनात उपकरणों की सहायता से लेजर किरणों से हमला बोलना भी अमेरिका को लुभा रहा है। इस तरह की प्रणाली को इवोल्यूशनरी एयर एंड स्पेस ग्लोबल लेजर इंगेजमेंट (ईगल) कहा गया है। इससे हवा से हवा में, सतह से सतह पर या अंतरिक्ष स्थित लेजर प्रक्षेपक सिस्टम से धरती पर संहारक क्षमता वाली लेजर किरणों फेंकी जा सकती हैं और दुश्मन के ठिकानों को नष्ट किया जा सकता है। तीसरा सबसे विचित्र स्पेस वैपन वह है, जिसे ‘रोड्स फ्रॉम गॉड’ जैसा अनूठा नाम दिया गया है। धातु की बनीं अंतरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा में 7200 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चक्कर काटने वाली करीब सौ किलो वजन वाली इन हाइपरवेलोसिटी सड़कों से पृथ्वी पर सचमुच मौत की वर्षा की जा सकती है। भविष्य में जिस स्पेस वॉर की आशंका जताई जा रही है, उसके कुछ और तौर-तरीकों की चर्चा है। जैसे एक तरीका है सैटेलाइटों को हैक कर लेना। वर्ष 2007 और 2008 में सैटेलाइटों की हैकिंग के कई मामले सामने आए थे। सैटेलाइट हैकिंग हो सकती है, यह बात 2013 में साबित भी हुई, जब चीनी हैकरों ने वास्तव में हैकिंग से अमेरिकी सैटेलाइट को जाम कर दिया। 2013 में ही ईरान ने बीबीसी टीवी के सैटेलाइट को भी हैक कर ईरान के बारे में दिखाए जा रहे कार्यक्रम को जाम कर दिया था। सैटेलाइट हैकिंग को स्पेस की जंग का जरिया बनाया जा सकता है, इसी चिंता के साथ यूरोपीय स्पेस एजेंसी क्वांटम इनक्रिप्शन तकनीक पर काम कर रही है जो सैटेलाइटों की हैकिंग को रोक सकती है।

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