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शिक्षा : विश्वविद्यालयों की रैंकिंग क्यों?

(साभार:डॉ. ललित कुमार)

    केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने लघु आकार के विविद्यालयों की अलग रैंकिंग प्रक्रिया शुरू करने का बयान गोवा विविद्यालय के दीक्षांत समारोह में ऐसे दिया जैसे इसके बाद इन छोटे विविद्यालयों के विकास के नये द्वार खुल जाएंगे। समझ नहीं आता कि भारत रैंकिंग को ही विविद्यालयों की उन्नति का विकल्प क्यों मान बैठा है? विविद्यालय की गुणवत्ता की दृष्टि से उसका प्रकार महत्त्वपूर्ण है। आम तौर पर तीन प्रकार के विविद्यालय स्थापित किए जाते हैं- एकात्मक, संघीय और सहबद्धता। यह वर्गीकरण इनकी प्रकृति के आधार पर किया जाता है। एकात्मक विविद्यालय श्रेष्ठ और उसके बाद संघीय विविद्यालय आता है। सहबद्धता या कह सकते हैं कि संबद्धता वाले विविद्यालय निम्न कोटि के होते हैं। आत्म-चिंतन का विषय है कि देश के अधिकांश विविद्यालय इसी श्रेणी में आते हैं। हमने जो भूल 1857 में विविद्यालयों की स्थापना के समय प्रारूप चुनने में की, उसे आज तक सुधार नहीं सके हैं। देश नालंदा एवं विक्रमशिला जैसे विविद्यालयों पर इतराता है, विश्व कैंब्रिज, ऑक्सफोर्ड, बोलोगना आदि को आदर्श मानता है, और हमने अपनाया लंदन विविद्यालय के प्रतिरूप को-जिसकी प्रकृति उस समय संबद्धता प्रदान करने वाली थी। आश्र्चय, भारत में उसके मॉडल को अपनाए जाने के कुछ दिन बाद खुद लंदन विविद्यालय ने अपना मॉडल बदल लिया। एक ही परिसर में अवस्थित ऐसा विविद्यालय जो मुख्य रूप से स्नातकोत्तर एवं शोध या विशेष परिस्थिति में स्नातक के अध्ययन के अवसर प्रदान करता है, एकात्मक विविद्यालय की श्रेणी में आता है। बनारस हिंदू विविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विविद्यालय इसके उदाहरण हैं। यूरोपीय विविद्यालयों के मॉडल पर विकसित ये विविद्यालय उच्च कोटि की शिक्षा एवं शोध पर जोर देते हैं। संघीय विविद्यालय में संबद्धता प्राप्त महाविद्यालय नहीं होते, बल्कि इनके सिर्फ अंगीभूत महाविद्यालय होते हैं, जिनके अकादमिक एवं प्रशासनिक कार्य सीधे तौर पर संबंधित विविद्यालय के अधीन होते हैं। पटना विविद्यालय और दिल्ली विविद्यालय इसी श्रेणी में आते थे किन्तु इनने संबद्धता प्रदान करके अपने स्वरूप को जटिल बना लिया है। देश में अधिकांश विविद्यालय सहबद्धता विविद्यालय की श्रेणी में आते हैं, और विविद्यालय मुख्यालय से दूर-दूर तक इसके संबद्धता प्राप्त महाविद्यालय फैले होते हैं। विविद्यालय के कई अन्य प्रकार और भी हैं, जैसे केंद्रीय विविद्यालय, राज्य विविद्यालय, मानित विविद्यालय, निजी विविद्यालय, विषय संबंधित विविद्यालय, कृषि विविद्यालय आदि, खुला विविद्यालय, राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान जैसे आईआईटी आदि। इन विभिन्न प्रकार के विविद्यालयों के प्रकार का इनकी गुणवत्ता से सीधा संबंध है, और निश्चय ही इनकी रैंकिंग की श्रेणी इनके प्रकार के आधार पर बनाई जानी चाहिए। सभी जानते हैं कि भारत में राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान और एकात्मक विविद्यालय उच्च शिक्षा के अच्छे संस्थान हैं, और रैंकिंग में इनका ऊंचा स्थान बिना मूल्यांकन के ही तय है। रैंकिंग से कहीं जरूरी है कि हम संस्थान की श्रेणी में परिवर्तन कर गुणवत्ता बढ़ाने का प्रयास करें। छोटा विविद्यालय और बड़ा विविद्यालय श्रेणी के प्रकार हो सकते हैं किन्तु अन्य संबंधित कारक भी उनकी प्रभावकता को प्रभावित करेंगे। तात्पर्य यह कि संकाय सदस्य संख्या एवं उनके शोध-पत्रों का प्रकाशन, अन्तरराष्ट्रीय संकाय सदस्य, अन्तरराष्ट्रीय विद्याथीं, रोजगार एवं अकादमिक स्तर-मुख्य कारक हैं, जो विविद्यालय को उच्च रैंकिंग प्रदान कराते हैं। पचास प्रतिशत से कम संकाय सदस्यों के साथ काम कर रहे भारत के नामचीन विविद्यालय भी सभी मानकों पर फिसड्डी साबित हो रहे हैं, और फिर ऐसे में विदेशी संकाय-सदस्य या फिर विदेशी विद्यार्थी भारतीय विविद्यालयों के लिए कैसे आकर्षित हो सकते हैं? टाइम्स उच्च शिक्षा की विविद्यालय रैंकिंग के मानक में शिक्षण-30, शोध-30, प्रशस्ति पत्र अथवा शोध प्रभाव- 30, अन्तरराष्ट्रीय आउटलुक-7.5 और औद्योगिक आमदनी-2.5 शामिल हैं। मानक में उच्च रैंकिंग के लिए आधारभूत संरचना के साथ-साथ मंजूर किए गएपद पर अध्यापकों की नियुक्ति अनिवार्य है।दुख के साथ कहना पड़ता है कि शायद भारत में आज एक भी उच्च शिक्षण संस्था नहीं है, जिसमें मंजूर किए गएसभी पद पर संकाय सदस्य कार्य कर रहे हैं। भारत ने अपने उच्च शिक्षा संस्थानों के मूल्यांकन के लिए जो मानक तय किए हैं, उनमें शिक्षण, अधिगम एवं संसाधन- 30, शोध प्रकाशन एवं प्रभावकारक-40, स्नातक आउटलुक-5, पहुंच एवं समावेशिता-15 व धारणा-10 मुख्य हैं। सरकार द्वारा स्थापित और निर्धारित मानक पर कल के प्रतिष्ठित संस्थान सरकार की निष्क्रियता के कारण पिछड़ रहे हैं। इस दृष्टि से समावेशिता को ध्यान में रखते हुए केंद्र एवं राज्य सरकारों को पहले संस्थानों की आधरभूत संरचना ठीक करनी होगी और फिर शत-प्रतिशत संकाय-सदस्य उपलब्ध कराने होंगे। मानक के मुख्य बिन्दु में यह भी शामिल करना होगा कि संस्थान में पहली पीढ़ी के कितने अधिगम-कर्ता हैं? पिछड़े समुदाय के विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व कितना है? पढ़ने वालों की सामाजिक, मनोवैज्ञानिक एवं आर्थिक स्थिति कैसी है? कितनी राशि में शिक्षा दी जा रही है? पूर्ववर्ती विद्यार्थियों का राष्ट्र एवं समाज निर्माण में कितना योगदान है? सिर्फ शिक्षण के लिए निर्मिंत संस्थाओं और सहबद्धता विविद्यालयों से शोध की अपेक्षा से पूर्व ढांचागत सुधार अपेक्षित है। अनियोजित ढंग से विविद्यालय खोलने, पूर्व की स्थापित संस्थानों की जगह बिना आवश्यकता के दूसरी संस्था स्थापित करना, विदेशी डिग्रीधारकों को अनावश्यक ढंग से अध्यापक नियुक्ति की अहर्ता प्रदान करना, शोध-पत्रों की साहित्यिक चोरी को रोक नहीं पाना, उच्च शिक्षा के विकास के लिए आवश्यक धन एवं अन्य संसाधन उपलब्ध नहीं करा पाना, जैसे पहलुओं पर गंभीरतापूर्वक विचार करके ही उच्च शिक्षा संस्थान के स्वास्य एवं इसकी रैंकिंग को सुधारा जा सकता है।(RS)

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